प्रयागराज के माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच छिड़ा विवाद अब बेहद तीखा हो गया है. मेला प्राधिकरण द्वारा भेजे गए नोटिस के जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रशासन पर कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या और जालसाजी का आरोप लगाया है. उन्होंने साफ किया कि उनका पट्टाभिषेक कोर्ट के आदेश से पहले ही हो चुका था. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया कि बीती रात 12 बजे के बाद एक कानूनगो उनके पास आया और रात में ही नोटिस स्वीकार करने को कहा. जब उन्होंने मना किया तो वे इसे चस्पा कर चले गए. उन्होंने सवाल उठाया कि मेला प्राधिकरण के सामने ऐसी क्या अर्जेंसी आ गई थी कि रात में ही नोटिस लगाया जा रहा था?
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अविमुक्तेश्वरानंद के वकील ने कहा- 'अवमानना प्रशासन ने की'
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ओर से सुप्रीम कोर्ट के वकील पीएन मिश्रा ने कानूनी तथ्य रखते हुए बताया कि प्रशासन जिस 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का हवाला दे रहा है, वह गलत है. उन्होंने कहा, 'स्वामी जी का पट्टाभिषेक 12 सितंबर 2022 को ही हो चुका था, जबकि प्रशासन जिस आदेश की बात कर रहा है वह 17 अक्टूबर से प्रभावी है. वकील ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद अपने आदेशों में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को कई जगह 'शंकराचार्य' लिखा है. उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी वासुदेवानंद की तरफ से पुरी के शंकराचार्य का फर्जी एफिडेविट और गलत तथ्य पेश कर कोर्ट से स्टे लिया गया था, जिसके खिलाफ जालसाजी का मामला लंबित है. वकील ने चेतावनी दी कि जिन अफसरों ने नोटिस देकर भ्रम खड़ा किया है उनके खिलाफ वे मानहानि की कार्रवाई की जाएगी.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन पर लगाया भेदभाव का आरोप
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि मेले में कई लोग खुद को शंकराचार्य लिखकर शिविर चला रहे हैं, लेकिन नोटिस सिर्फ गौ रक्षा की बात करने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ही दिया गया. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पिछले साल महाकुंभ की स्मारिका में प्रशासन ने खुद उनकी फोटो के साथ जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद छापा था.
'अन्न-जल नहीं छोड़ा, यह धरना नहीं टेक है'
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट किया कि उन्होंने न अन्न छोड़ा है न जल. उन्होंने कहा, "यह न अनशन है न धरना, बल्कि एक टेक (संकल्प) है कि जब तक सम्मानजनक स्नान का मौका नहीं मिलेगा, तब तक बाहर रहेंगे. यह टेक गंगा-यमुना के सामने है, किसी सरकार के सामने नहीं."
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अखिलेश यादव का जिक्र कर ये कहा
उन्होंने अखिलेश यादव का जिक्र करते हुए कहा कि गौ रक्षा करने वाले का वे समर्थन करेंगे. साथ ही उन्होंने उन पुलिस अफसरों पर कार्रवाई की बात कही जिन्होंने बच्चों की चोटी पकड़कर उन्हें मारा.
क्या था पूरा विवाद?
विवाद तब शुरू हुआ जब रविवार मौनी अमावस्या वाले दिन पुलिस ने कथित तौर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके अनुयायियों को संगम स्नान से रोका और मारपीट की. इसके बाद प्रशासन ने उन्हें 24 घंटे का नोटिस थमाया और पूछा कि वह खुद को शंकराचार्य कैसे कह रहे हैं?
प्रशासन के नोटिस की ये थीं बड़ी बातें
- ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य के पद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक केस (अपील संख्या 3011/2020) चल रहा है. जब तक कोर्ट इस पर अपना आखिरी फैसला नहीं दे देता या कोई नया आदेश जारी नहीं करता, तब तक कोई भी व्यक्ति कानूनी रूप से ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य नहीं बन सकता (पट्टाभिषेक नहीं कर सकता).
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, फिलहाल इस पद पर कोई भी आधिकारिक तौर पर नियुक्त नहीं है. इसके बावजूद आपने (स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद) माघ मेला 2025-26 के अपने शिविर (कैंप) के बाहर लगे बोर्ड पर खुद को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य लिखा है. प्रशासन की नजर में यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना है.
- प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जवाब मांगा है कि जब कोर्ट ने रोक लगा रखी है तो वह अपने नाम के आगे शंकराचार्य शब्द का इस्तेमाल कैसे कर रहे हैं और खुद का प्रचार इस पद के रूप में क्यों कर रहे हैं? इसका स्पष्टीकरण उन्हें 24 घंटे के अंदर देना होगा.
नोटिस में पट्टाभिषेक का जिक्र है उसका मतलब क्या है?
पट्टाभिषेक का आसान मतलब है राज्याभिषेक या पद की विधिवत ताजपोशी. धार्मिक और आध्यात्मिक संदर्भ में जब किसी विद्वान या संत को किसी पीठ (जैसे शंकराचार्य की ज्योतिष पीठ) के सर्वोच्च पद पर बैठाया जाता है, तो उस प्रक्रिया को पट्टाभिषेक कहा जाता है. इसे आप एक शपथ ग्रहण समारोह की तरह समझ सकते हैं जहां धार्मिक रीति-रिवाजों और मंत्रोच्चार के बीच उस व्यक्ति को उस पद की शक्तियां, ज़िम्मेदारियां और शंकराचार्य जैसी उपाधि सौंपी जाती है. आसान शब्दों में यह वह आधिकारिक घोषणा और धार्मिक अनुष्ठान है जिसके बाद ही कोई व्यक्ति कानूनी और धार्मिक रूप से उस गद्दी का स्वामी माना जाता है.
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