बागपत में धर्म परिवर्तन को लेकर विवाद चर्चा में बना हुआ है. यह मामला एक महिला के हिंदू धर्म अपनाने के बाद शुरू हुआ. महिला ने शादी के बाद अपने धर्म को बदलकर हिंदू धर्म अपनाया और पूजा पाठ करने लगी. इसके बाद पड़ोस में रहने वाले कुछ लोगों ने उस पर दबाव डालना शुरू कर दिया. महिला और उसके परिवार पर धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे. उनके मंदिर और मूर्तियाँ तोड़ी गईं, बच्चों पर उर्दू पढ़ने का दबाव डाला गया और हिंदू त्यौहार मनाने से रोका गया. यह विवाद धार्मिक सहिष्णुता और कानून व्यवस्था की चुनौती बन गया है. महिलाने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से न्याय एवं सुरक्षा की मांग की है.
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महिला का आरोप है कि पड़ोसी उसके हिंदू धर्म अपनाने से खुश नहीं हैं. वे उसके घर घुसकर मंदिर तोड़ते हैं और पूजा-पाठ पर प्रतिबंध लगाते हैं. उनके बच्चों को उर्दू पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है. परिवार को लगातार धार्मिक दबाव, धमकियाँ और अपमान झेलना पड़ता है. पीड़िता ने पुलिस में शिकायत की है. लेकिन उनको उचित समर्थन नहीं मिल पा रहा. पुलिस मामले की जांच कर रही है. हालांकि पड़ोसियों के बीच पालतू बिल्ली को लेकर भी विवाद बताया गया है.
महिला की स्थिति न्यायिक और सामाजिक दृष्टि से चिंता का विषय है. धार्मिक स्वतंत्रता नागरिक अधिकार है जिसे किसी भी हालत में बाधित नहीं किया जाना चाहिए. इस मामले ने उत्तर प्रदेश में धार्मिक सहिष्णुता, कानून व्यवस्था और सामाजिक मेलजोल का सवाल उठाया है. पीड़िता का कहना है कि वह अपने धर्म में खुश है और किसी भी दबाव में धर्म परिवर्तन नहीं करेगी. प्रशासन ने निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया है.
गोलीबंद घटनाओं ने बागपत में धार्मिक तनाव बढ़ाए हैं. लेकिन पुलिस जांच में सभी पहलुओं को ध्यान में रखा जा रहा है. न्यायिक प्रक्रिया के तहत निष्पक्ष कार्यवाही से ही सामाजिक शांति संभव है. धर्म और संस्कृति का सम्मान करते हुए हम एक दूसरे के साथ मेलजोल बढ़ा सकते हैं. बागपत मामला इस ओर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है जहां न्याय और सहिष्णुता दोनों की जरूरत है.
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