LPG Cylinder Price Hike: गैस सिलेंडर के बढ़े दामों ने बिगाड़ा रसोई का बजट... चूल्हा फूंकने को मजबूर हुए मध्यवर्गीय परिवार, सरकार से राहत की गुहार

एलपीजी गैस सिलेंडर के दाम ₹450 से बढ़कर ₹1000 होने से मध्यवर्गीय और संयुक्त परिवारों का बजट बिगड़ गया है. महंगाई के कारण गृहणियां परेशान हैं और लोग दोबारा लकड़ी व अंगीठी का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं. आम जनता ने सरकार से दाम घटाने की मांग की है.

यूपी तक

• 08:01 PM • 07 Jun 2026

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उत्तर प्रदेश सहित देश भर में एलपीजी गैस (LPG Gas Cylinder) की बढ़ती कीमतों ने मध्यवर्गीय और संयुक्त परिवारों के होम बजट को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है. कभी ₹450 में मिलने वाला गैस सिलेंडर अब लगभग ₹1,000 के आंकड़े को छू रहा है. दामों में हुई इस बेतहाशा बढ़ोतरी के कारण आम आदमी के लिए रसोई चलाना एक बड़ा आर्थिक संघर्ष बन गया है, जिससे उनका रोज़मर्रा का जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है.

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सिलेंडर हुआ ₹1000 के पार, मजबूरी में सुलगने लगीं लकड़ियां और अंगीठी

बढ़ती महंगाई ने आम परिवारों को आधुनिकता से वापस पुराने ढर्रे पर लौटने के लिए मजबूर कर दिया है:

लकड़ी और अंगीठी का सहारा: आर्थिक दबाव के चलते कई परिवार अब गैस छोड़कर फिर से लकड़ी के चूल्हे या अंगीठी पर खाना बनाने को मजबूर हो गए हैं. पहले जो पारंपरिक चूल्हा एक विकल्प हुआ करता था, वह अब परिवारों की सबसे बड़ी मजबूरी बन गया है.

संयुक्त परिवारों पर दोहरी मार: बड़े और संयुक्त परिवारों में हर महीने कम से कम दो सिलेंडरों की खपत होती है. ₹1000 के भाव से दो सिलेंडरों का खर्च उठाना बेहद कठिन हो गया है. इसके अलावा, जमीन पर सिलेंडरों का वितरण भी नियमित नहीं हो पा रहा है, जिससे किल्लत और बढ़ गई है.

किचन के बजट में भारी उछाल, बच्चों के टिफिन पर भी पड़ा असर

महंगाई की चौतरफा मार सिर्फ गैस तक सीमित नहीं है. राशन, तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम भी लगातार आसमान छू रहे हैं:

इसके कारण घर के मासिक बजट में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिसका सीधा असर बच्चों के स्कूल टिफिन जैसी छोटी और जरूरी चीजों पर भी दिखने लगा है.

आर्थिक तंगी का असर घर के माहौल पर भी पड़ रहा है. कई बार ऐसी नौबत आ जाती है कि लोग भारी मानसिक और आर्थिक दबाव के कारण बिना खाना खाए ही बाहर निकलने को मजबूर होते हैं.

'ख्वाहिशें छोड़ बस पेट भरने की चिंता'- गृहणियों का छलका दर्द

रसोई के बजट को संभालने वाली महिलाओं और गृहणियों पर इसका सबसे गहरा मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक असर पड़ा है. महिलाओं का कहना है कि:

"महंगाई के इस दौर में हमारी अपनी इच्छाएं और ख्वाहिशें पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं. अब हम अपनी पसंद-नापसंद को छोड़कर बस इस एक चिंता में लगे रहते हैं कि किसी तरह कम बजट में परिवार का पेट भर जाए."

सरकार से मांग: कीमतों पर लगे लगाम और सप्लाई में हो सुधार

इस संकट के बावजूद मध्यवर्गीय परिवार अपनी हिम्मत बनाए हुए हैं और एक बेहतर जीवन की उम्मीद कर रहे हैं. देश के आम नागरिक और गृहणियां सरकार से पुरजोर मांग कर रहे हैं कि: