गाजियाबाद के हरीश राणा को इच्छा मृत्यु देने का सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला न केवल कानून, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के लिहाज से भी एक बड़ी घटना बन गया है. इस फैसले को सुनाते समय जस्टिस जे.बी. पारदीवाला इतने भावुक हो गए कि वे रो पड़े. आपको बता दें कि हरीश राणा एक होनहार छात्र थे, लेकिन 2013 में एक हादसे के बाद वे कोमा में चले गए. पिछले 13 वर्षों से वे बिस्तर पर थे, जहां उनके माता-पिता ने अपनी पूरी जमापूंजी और जीवन उनकी सेवा में लगा दिया.
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माता-पिता ने अंततः थक हारकर कोर्ट से अपने बेटे के लिए 'गरिमापूर्ण मृत्यु' की मांग की, क्योंकि डॉक्टरों के अनुसार उनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बची थी.
ऐतिहासिक फैसला और भावुक क्षण
जस्टिस पारदीवाला ने फैसले की शुरुआत शेक्सपियर की प्रसिद्ध पंक्ति "To be or not to be" (होना या न होना) से की. उन्होंने कहा कि यह उनके लिए सबसे कठिन फैसलों में से एक है. एम्स की रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने माना कि किसी भी व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने के अधिकार की तरह ही गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी है. बेंच के दूसरे सदस्य जस्टिस विश्वनाथन ने संस्कृत का श्लोक पढ़कर चिंता और चिता के अंतर को समझाया.
निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) क्या है?
इसमें किसी मरीज को मारने के लिए कुछ दिया नहीं जाता, बल्कि उसका लाइफ सपोर्ट सिस्टम (जैसे वेंटिलेटर, आर्टिफिशियल फीडिंग ट्यूब) धीरे-धीरे हटा लिया जाता है. मरीज को दवाएं देना बंद कर दिया जाता है और उसकी मृत्यु प्राकृतिक तरीके से होने दी जाती है. भारत में 2011 (अरुणा शानबाग केस) और 2018 (कॉमन कॉज केस) के बाद इसे कानूनी मान्यता मिली थी.
कौन हैं जस्टिस जे.बी. पारदीवाला?
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला पारसी समुदाय से आते हैं और उनके पूर्वज भी कानूनी पेशे से जुड़े थे. वे इससे पहले इलेक्टोरल बॉन्ड (Electoral Bond) को असंवैधानिक घोषित करने, EWS आरक्षण और महाराष्ट्र सरकार के संकट जैसे कई बड़े और सख्त फैसलों का हिस्सा रहे हैं. वे अपनी स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते हैं और वरिष्ठता के आधार पर भविष्य में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) भी बन सकते हैं.
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