रात में रेलवे ट्रैक के किनारे क्यों जलती है छोटी-सी लाइट? काम जानकर चौंक जाएंगे

यूपी तक

• 11:19 AM • 18 Sep 2026

रेलवे स्टेशन या यार्ड में रात के समय ट्रैक के पास जलने वाली छोटी-छोटी लाइट सिर्फ रोशनी के लिए नहीं होतीं. फाउलिंग मार्क, पॉइंट और शंटिंग से जुड़े इंडिकेटर रेलवे कर्मचारियों को ट्रैक की स्थिति और सुरक्षित सीमा समझने में मदद करते हैं. जानिए इन लाइट्स का रेलवे में क्या महत्व है.

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अगर आपने रात में किसी रेलवे स्टेशन या यार्ड को गौर से देखा है तो ट्रैक के आसपास छोटी-छोटी लाइट जलती हुई नजर आई होगी. कई बार ये लाइट पटरियों के बिल्कुल पास या उस जगह दिखाई देती हैं, जहां एक ट्रैक दूसरे ट्रैक से जुड़ता या अलग होता है. पहली नजर में लगता है कि रोशनी के लिए लगाया गया कोई छोटा बल्ब है.

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हालांकि, रेलवे में ऐसी लाइट और इंडिकेटर सिर्फ अंधेरा दूर करने के लिए नहीं होते. खासकर स्टेशन और यार्ड में, जहां ट्रेनों के कोच जोड़े या अलग किए जाते हैं और ट्रैक बदले जाते हैं, वहां छोटी-सी जानकारी भी सुरक्षित संचालन के लिए जरूरी होती है. इसी वजह से अलग-अलग जगहों पर सिग्नल और इंडिकेटर लगाए जाते हैं.

सबसे पहले समझिए फाउलिंग मार्क क्या है

रेलवे ट्रैक पर एक निशान होता है, जिसे फाउलिंग मार्क कहा जाता है. आसान शब्दों में इसे दो ट्रैक के बीच तय की गई सुरक्षित सीमा का निशान समझ सकते हैं. फाउलिंग मार्क यह समझने में मदद करता है कि किसी ट्रैक पर खड़े वाहन को किस सीमा के भीतर रखना सुरक्षित है.

जहां दो पटरियां मिलती या क्रॉस होती हैं, वहां यह तय करना जरूरी होता है कि ट्रेन, इंजन या कोच को कितनी दूर तक खड़ा किया जा सकता है. अगर कोई ट्रेन या कोच इस सीमा से आगे खड़ा हो जाए, तो दूसरी पटरी से गुजरने वाली ट्रेन के रास्ते में रुकावट पैदा हो सकती है.

रात में इस निशान के पास रोशनी क्यों जरूरी है?

दिन के उजाले में ट्रैक और उससे जुड़े निशान आसानी से देखे जा सकते हैं, लेकिन रात में खासकर यार्ड के उन हिस्सों में, जहां पर्याप्त रोशनी नहीं होती, इन संकेतों को पहचानना मुश्किल हो सकता है.

शंटिंग के दौरान यह बात और जरूरी हो जाती है. शंटिंग का मतलब- स्टेशन या यार्ड में इंजन और कोचों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना होता है. इस दौरान ट्रेन सामान्य गति से नहीं चल रही होती, बल्कि इंजन को आगे-पीछे करके डिब्बे जोड़े या अलग किए जाते हैं.

ऐसे में ट्रैक की स्थिति, पॉइंट और सुरक्षित सीमा की जानकारी रेलवे कर्मचारियों के लिए बेहद जरूरी होती है. रात में दिखाई देने वाली लाइट या इंडिकेटर इसी पहचान को आसान बनाने में मदद करते हैं.

पॉइंट इंडिकेटर भी होता है अहम

रेलवे में कई जगह एक ट्रैक आगे जाकर दो अलग-अलग दिशाओं में बंटता है. इस व्यवस्था को पॉइंट्स के जरिए नियंत्रित किया जाता है. इनकी मदद से ट्रेन को एक लाइन से दूसरी लाइन पर भेजा जा सकता है.

मान लीजिए कोई ट्रेन मुख्य लाइन से आ रही है और उसे स्टेशन की दूसरी लाइन पर ले जाना है. पॉइंट की स्थिति बदलने पर ट्रेन का रास्ता दूसरी पटरी की तरफ हो जाता है. ऐसे में पॉइंट इंडिकेटर रेलवे स्टाफ और लोको पायलट को पॉइंट की स्थिति समझने में मदद करता है. रात के समय इस तरह के संकेत रोशनी के जरिए आसानी से दिखाई दे सकते हैं.

शंटिंग के समय बढ़ जाती है इनकी अहमियत

स्टेशन और यार्ड में शंटिंग के दौरान कई तरह के छोटे संकेत और इंडिकेटर काम आते हैं. इस प्रक्रिया में इंजन को बार-बार आगे या पीछे किया जाता है. कभी कोच जोड़े जाते हैं तो कभी अलग किए जाते हैं.

इस दौरान रेलवे कर्मचारियों को देखना होता है कि इंजन या कोच सुरक्षित सीमा के भीतर हैं, आगे का पॉइंट किस स्थिति में है और किसी दूसरी लाइन पर आवाजाही में कोई बाधा तो नहीं आएगी. यही वजह है कि रात के समय यार्ड में दिखाई देने वाली छोटी-छोटी लाइटें रेलवे के संचालन में अपनी भूमिका निभाती हैं.

क्या हर छोटी लाइट का काम एक जैसा होता है?

नहीं. रेलवे में अलग-अलग तरह के सिग्नल, इंडिकेटर और ट्रैक से जुड़े उपकरण होते हैं. इनका काम उस जगह लगाए गए उपकरण और रेलवे के सिग्नलिंग सिस्टम पर निर्भर करता है.

ट्रैक के किनारे दिखाई देने वाली हर छोटी लाइट को एक ही तरह का इंडिकेटर मानना सही नहीं होगा. कुछ लाइट ट्रैक या पॉइंट की स्थिति से जुड़ी हो सकती हैं, जबकि दूसरे संकेत शंटिंग और सुरक्षित संचालन में मदद करते हैं.

अगली बार स्टेशन पर दिखे तो गौर कीजिए

रात में रेलवे स्टेशन या यार्ड में ट्रैक के पास जलती छोटी-सी लाइट पहली नजर में बेहद मामूली लग सकती है, लेकिन जिन जगहों पर कई ट्रैक आपस में जुड़ते हैं, ट्रेन का रास्ता बदला जाता है या कोचों की शंटिंग होती है, वहां ऐसे संकेतों की भूमिका बड़ी हो सकती है.