Opinion: UCC को चुनावी अंकगणित से न देखे सपा, असली मुद्दा महिलाओं के समान अधिकार का है

यूपी तक

16 Sep 2026 (अपडेटेड: 16 Sep 2026, 07:32 PM)

Opinion: समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू करने की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा. इसके बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने UCC को “अंडरग्राउंड कम्युनल कांस्पिरेसी” बताया है.

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Opinion: समान नागरिक संहिता कोई चुनावी नारा नहीं है. यह उस संवैधानिक आदर्श से जुड़ा प्रश्न है, जिसमें एक देश में नागरिक का अधिकार उसके धर्म से नहीं, उसके नागरिक होने से तय हो. 

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संविधान के नीति निदेशक तत्वों में यही दिशा अंकित है. बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का भी स्पष्ट मत रहा कि विधि धर्म के आधार पर नहीं बननी चाहिए. फिर भी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी इस विषय पर खुलकर विरोध का स्वर अपनाए हुए है. 

गृह मंत्री अमित शाह के इस संकेत के बाद कि 2029 से पहले एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी लागू करने की दिशा में बढ़ा जाएगा, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे “अंडरग्राउंड कम्युनल कांस्पिरेसी” करार दिया. यह प्रतिक्रिया कानूनी बहस से अधिक राजनीतिक संकेत है. संकेत यह कि पार्टी सुधार को सुधार नहीं, समीकरण का खतरा मान रही है.

यहीं वह बिंदु है जहां पीडीए का दावा परीक्षा में उतरता है. पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक-और बीच में “आधी आबादी” का नया पाठ-सपा की राजनीति का केंद्रीय सूत्र रहा है. कुछ समय पहले तक यह कहा गया कि पीडीए में ‘ए’ का अर्थ केवल अल्पसंख्यक नहीं, आधी आबादी यानी महिलाएं भी हैं. 

महिला आरक्षण, प्रतिनिधित्व और सम्मान की भाषा बार-बार दोहराई गई. किंतु यूसीसी जैसे विषय पर, जिसका सीधा संबंध विवाह, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार में समानता से है, वही पार्टी विरोध में खड़ी दिखती है. इससे एक सरल निष्कर्ष निकलता है. 

सपा के लिए पीडीए का विस्तार भाषण तक सीमित है. जब मसला व्यक्तिगत कानूनों में समान अधिकार का आता है, तब प्राथमिकता मुस्लिम वोट की रक्षा बन जाती है. आधी आबादी का नारा तब तक चलता है, जब तक वह वोट बैंक से न टकराए.

यह द्वैत नया नहीं है, पर अब यह और साफ हो गया है. यूसीसी का विरोध यदि सिद्धांत का होता, तो पार्टी को समान नागरिक संहिता के उन पक्षों पर भी बोलना चाहिए था जो महिलाओं को कमजोर व्यक्तिगत कानूनों से निकालकर एक समान कानूनी छत देते हैं. 

बहुविवाह, तलाक की असमान प्रक्रिया और उत्तराधिकार की भिन्न व्यवस्थाएं किसी एक समुदाय की आंतरिक बात नहीं रह गई हैं. ये न्याय के प्रश्न हैं. न्याय का प्रश्न चुनावी अंकगणित से बड़ा होना चाहिए. 

जब कोई दल संविधान बचाने का गीत गाता है, एकता की दुहाई देता है और भाईचारे का मंच सजता है, तब उससे अपेक्षा यही बनती है कि वह नागरिक समानता के सबसे कठिन अध्याय पर चुप न रहे. सपा इस अध्याय पर चुप नहीं, विरोध में सक्रिय है. चुप्पी से अधिक यह सक्रियता बताती है कि सिद्धांत कहां झुकता है.

राजनीति में वोट का हिसाब स्वाभाविक है. लोकतंत्र वोट से ही चलता है. आपत्ति तब है, जब वोट का हिसाब सुधार का मापदंड बन जाए. यदि कोई कानून महिलाओं को समान अधिकार देता है, तो उसका स्वागत या आलोचना उसके प्रावधानों के आधार पर होनी चाहिए, समुदाय विशेष की प्रतिक्रिया के आधार पर नहीं. 

सपा का वर्तमान रुख यही संदेश देता है कि सुधार स्वीकार्य है, जब तक वह उसके पारंपरिक गठजोड़ को छूए नहीं. छूते ही वही सुधार साजिश बन जाता है. यह भाषा विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं, लामबंदी की सुविधा है. लामबंदी अल्पकाल में भीड़ जुटा सकती है, दीर्घकाल में वह सामाजिक न्याय के दावे को खोखला कर देती है.

प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाता महत्वपूर्ण हैं, इसे नकारना तथ्यों से मुंह मोड़ना होगा. लेकिन उतनी ही बड़ी सच्चाई यह भी है कि हर समुदाय की महिलाएं भी मतदाता हैं, नागरिक हैं और अधिकार की हकदार हैं. पीडीए यदि सचमुच सामाजिक न्याय का सूत्र है, तो उसमें पिछड़ी, दलित और अल्पसंख्यक महिलाओं के कानूनी अधिकार सबसे आगे होने चाहिए. 

यूसीसी का विरोध करके सपा ठीक उलटा संदेश देती है. वह बताती है कि अल्पसंख्यक पुरुष नेतृत्व की आशंका पार्टी के लिए आधी आबादी के अधिकार से भारी है. ऐसे में पीडीए दिखावा लगता है, क्योंकि उसका विस्तार वहां रुक जाता है जहां सबसे कठिन समानता शुरू होती है.

संविधान का रोना तब तक विश्वसनीय है, जब तक संविधान के उस हिस्से को भी अपनाया जाए जो समान नागरिक संहिता की ओर इशारा करता है. एकता की बात तब तक पूरी नहीं होती, जब तक कानून के सामने सब बराबर न हों. 

बंधुत्व का प्रदर्शन तब तक अधूरा है, जब तक बहन के अधिकार भाई के रिवाज से छोटे समझे जाते रहें. सपा इन तीनों शब्दों-संविधान, एकता, बंधुत्व-का बार-बार प्रयोग करती है. यूसीसी पर उसका रुख पूछता है कि ये शब्द कहां हैं और संकल्प कहां है.

यूसीसी का अंतिम रूप क्या होगा, उसमें रीति-रिवाज की कितनी गुंजाइश रहेगी, यह विधायी बहस का विषय है. उस बहस में सवाल उठाने का अधिकार सभी दलों को है. 

पर बहस का केंद्र यदि वोट बैंक की सुरक्षा बन जाए और महिलाओं की समानता हाशिए पर चली जाए, तो वह संवैधानिक संवाद नहीं, चुनावी हिसाब है. सपा को तय करना होगा कि वह आधी आबादी की पार्टी है या केवल एक समुदाय की आशंका की पार्टी. 

जब तक यह फैसला नहीं होता, पीडीए का विस्तार भाषणों में चलता रहेगा और असली परीक्षा, महिलाओं के समान अधिकार की परीक्षा, टाल दी जाएगी. वोटबैंक का चश्मा उतारकर देखें, तो यूसीसी का पहला चेहरा किसी समुदाय का नहीं, उन महिलाओं का है जिन्हें एक देश में एक कानून की छांव चाहिए.

(लेखिका शारदा चतुर्वेदी नोएडा भाजपा महानगर की महिला मोर्चा अध्यक्ष हैं। सामाजिक कार्यों से जुड़ी हुई हैं। राजनीतिक और समाजिक विषयों पर लेखन करती हैं।)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)