Opinion: प्रयागराज महाकुंभ भगदड़ मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश-30 दिन में पीड़ितों को मुआवजा, 'न्याय' की राह हुई आसान

प्रयागराज महाकुंभ भगदड़ मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने जिला प्रशासन को 30 दिनों के भीतर सभी मुआवजा दावों का निपटारा करने का निर्देश दिया है.

Allahabad high court (Photo: ITG)

यूपी तक

01 May 2026 (अपडेटेड: 01 May 2026, 07:48 PM)

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गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर प्रयागराज में जब करोड़ों कंठ से ‘हर हर गंगे’ का उद्घोष उठता है तो वह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं होता, वह भारत की आत्मा का स्पंदन होता है. महाकुंभ इस देश की उस अखंड आस्था का प्रतीक है जो सदियों से बहती आ रही है, जो राजाओं के उत्थान-पतन से नहीं डिगी, जो आक्रांताओं की तलवारों से नहीं टूटी. पिछले महाकुंभ में श्रद्धालुओं की संख्या ने तमाम रिकॉर्ड तोड़ डाले. ऐसे आयोजन में मौनी अमावस्या की उस रात भगदड़ में कई लोगों ने अपने प्रियजन खोए. उनका दर्द असली है, उनके आंसू असली है. इस दर्द को सरकार व न्यायपालिका, दोनों ने महसूस किया.

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कहां है इसमें विसंगति?

न्याय की दुनिया में बार-बार एक बात दोहराई जाती है कि न्याय केवल होना नहीं चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए और वर्तमान में यही हो रहा है. खुली अदालत में, सबके सामने, पूरी प्रक्रिया के साथ. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाकुंभ भगदड़ मामले पर सुनवाई के बाद 30 अप्रैल को स्पष्ट निर्देश दिए- मुआवजे के समस्त दावों का निपटारा 30 दिनों के भीतर जिला प्रशासन करेगा.  न्यायिक आयोग का काम केवल भगदड़ के कारणों की जांच करना और भविष्य के लिए सुझाव देना है. अब इसमें विसंगति कहां है?  न्याय सिर्फ हो नहीं रहा, दिख भी रहा है.

दर्द में राजनीतिक भविष्य की तलाश

जब कोई बड़ी त्रासदी होती है, तो दो तरह के लोग सामने आते हैं. एक वे जो घाव भरने में लग जाते हैं और दूसरे वे जो घाव को कुरेदते रहते हैं. इसलिए नहीं कि उन्हें पीड़ितों की चिंता है, बल्कि इसलिए कि उन्हें इस दर्द में अपना राजनीतिक भविष्य दिखता है. फिर भी कोर्ट के आदेश के आलोक में हम इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं कि क्या सरकार अपनी जिम्मेदारी से कभी पीछे हटी? क्या उसने अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ा?

प्रशासन को जिम्मेदारी सौंपना सही

जो लोग इस तरह के सवाल उठाते हैं, वस्तुतः वे न्यायिक प्रक्रिया को नहीं समझते या समझकर भी जानबूझकर गलत बता रहे हैं. मुआवजा जिला प्रशासन तय करे, इसमें गहरी समझ है. जिला प्रशासन वह इकाई है, जो जमीन पर है जो हर पीड़ित परिवार की परिस्थिति जानती है, जो यह बता सकती है कि किस घर का कमाने वाला गया, किस परिवार में छोटे बच्चे हैं, किसके पास और कोई सहारा नहीं. कोई दूरस्थ समिति, कोई दिल्ली या लखनऊ में बैठा आयोग, वह यह संवेदनशील आकलन नहीं कर सकता. इसलिए कोर्ट ने यह जिम्मेदारी उन्हें सौंपी, जो सबसे करीब हैं. यह प्रशासनिक ठंडापन नहीं, यह व्यावहारिक संवेदनशीलता है.

विलंब नहीं निश्चितता

जांच को मुआवजे से अलग रखना, यह तो न्याय का बुनियादी सिद्धांत है. अगर एक ही संस्था जांच भी करे और मुआवजा भी तय करे, तो वह न्याय नहीं, सत्ता का एकाधिकार होगा. जांच अलग, मुआवजा अलग, ताकि पारदर्शिता रहे, जवाबदेही रहे, और किसी को शिकायत का कोई मौका न मिले. अब 30 दिन की समय-सीमा की बात करते हैं। कुछ लोग इसे देरी बताएंगे. लेकिन यह देरी नहीं, यह निश्चितता है. हाईकोर्ट ने डेडलाइन देकर एक अनिश्चितता को खत्म किया है. अब एक स्पष्ट घड़ी चल रही है एक बाध्यकारी समय-सीमा है. एक तय तारीख है, जब सबको मुआवजा मिल चुका होगा. यह वही काम है जो एक जिम्मेदार, संवेदनशील और सक्रिय न्यायपालिका करती है. किसी भी हादसे में दावों के सत्यापन, तथ्य व दस्तावेज संकलित करने में समय लगता है. इसलिए जिला प्रशासन को मिली यह समय सीमा, ठोस और टिकाऊ जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया है.

सच सामने लाने के लिए आयोग

अब पीछे चलते हैं, 2025 महाकुंभ की उस रात, जब हादसा हुआ। देखना होगा कि सरकार ने क्या-क्या किया. तत्काल राहत और बचाव कार्य शुरू हुए। घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया. पीड़ित परिवारों से संपर्क किया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं स्थिति की निगरानी की और सबसे महत्वपूर्ण.. एक स्वतंत्र न्यायिक आयोग का गठन. यह आयोग क्यों बनाया गया? इसलिए नहीं कि सच्चाई छिपाई जा सके, बल्कि इसलिए कि सच पूरी तरह, निष्पक्ष रूप से बिना किसी दबाव के सामने आए. जब आप किसी आयोग को उसकी रिपोर्ट आने से पहले ही ‘बेअसर’ घोषित कर देते हैं तो आप न्याय की मांग नहीं कर रहे, आप निष्कर्ष पहले ही तय कर रहे हैं. कोई 30 दिन की समय-सीमा को ‘देरी’ बताए तो मान लीजिए कि वह न्यायिक प्रक्रिया को नहीं समझता या निहित कारणों से समझना ही नहीं चाहता.

जिम्मेदारी के साथ संवेदनशीलता भी

महाकुंभ में हादसे पहले भी हुए हैं. 2013 के महाकुंभ में इलाहाबाद स्टेशन पर हुआ हादसा कौन भूल सकता है, जो मौनी अमावस्या के दिन ही हुआ था. लेकिन, उस समय की घटना में और 2025 की घटना में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का अंतर है. योगी सरकार ने अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से समझा. संगम आज भी है उसमें बह रही गंगा, यमुना और सरस्वती की धारा की तरह न्यायपालिका, प्रशासन और सरकार की धारा भी एक दिशा में बह रही है न्याय की दिशा में, सच्चाई की दिशा में, पीड़ितों के हक की दिशा में, न्याय की राह आसान नहीं होती.  लेकिन जब व्यवस्था उस राह पर चल रही हो, ईमानदारी से, जवाबदेही से, पारदर्शिता से, तो हमें उस पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि भरोसा ही वह नींव है जिस पर न्याय का महल खड़ा होता है.

लेखक: रतन कुमार श्रीवास्तव (पूर्व आईपीएस)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)