Harish Rana Case Verdict: पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में झी रहे गाजियाबाद निवासी हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. यह बात साल 2013 की है. तब हरीश राणा चंडीगढ़ में रहकर पढ़ाई कर रहे थे. फिर वो बुरा दिन आया जब हरीश अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए. इस दर्दनाक हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोटें आई थीं. हरीश इसके बाद से ही 100 फीसदी दिव्यांगता का शिकार हो गए और लगातार बिस्तर पर अचेत हालत में रहे. लंबे समय तक बिस्तर पर रहने के कारण उनके शरीर पर गहरे घाव बनने लगे. बेटे को इस हाल में देख माता-पिता से रहा नहीं गया. उन्होंने कोर्ट से अपने बेटे के लिए इच्छा मृत्यु की मांग की क्योंकि वे हरीश के ठीक होने की उम्मीद छोड़ चुके थे. अब सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में बड़ा फैसला सुनाते हुए हरीश को इच्छा मृत्यु देने की मांग स्वीकार कर ली है.
ADVERTISEMENT
सुप्रीम कोर्ट के जज ने क्या-क्या कहा?
सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने एम्स (AIIMS) की रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि हरीश के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है. जस्टिस पारदीवाला ने कहा, "यह हमारे लिए मुश्किल फैसला है, पर हम इस लड़के को यूं अपार दुख में नहीं रख सकते."
जस्टिस विश्वनाथन ने इस दौरान एक प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक पढ़ते हुए कहा:
चिंतायाश्च चितायाश्च बिन्दुमात्रं विशिष्यते |
चिता दहति निर्जीवं चिन्ता दहति जीवनम् ||
इसका मतलब है कि चिंता और चिता इन शब्दों में केवल एक बिंदु का फर्क है. चिता निर्जीव शरीर को जलाती है. लेकिन चिंता जीवित इंसान को ही जला देती है.
कोर्ट ने हरीश के परिवार की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने कभी उसका साथ नहीं छोड़ा. किसी से प्यार करने का मतलब सबसे बुरे समय में भी उसकी देखभाल करना है.
हरीश राणा को कैसे दी जाएगी इच्छा मृत्यु?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से पैसिव यूथेनेशिया के नियमों के तहत होगी. इसके लिए ये कदम उठाए जाएंगे:
- हरीश को एम्स के 'पैलिएटिव केयर' (Palliative Care) विभाग में भर्ती किया जाएगा.
- कोर्ट ने आदेश दिया है कि हरीश को जीवित रखने के लिए दिए जा रहे सभी मेडिकल ट्रीटमेंट धीरे-धीरे वापस ले लिए जाएं.
- कोर्ट ने निर्देश दिया है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि पूरी प्रक्रिया मानवीय हो और हरीश को कम से कम पीड़ा हो.
- सुप्रीम कोर्ट इस फैसले के क्रियान्वयन पर चार हफ्ते बाद फिर से सुनवाई करेगा.
पैसिव यूथेनेशिया में क्या-क्या होता है?
पैसिव यूथेनेशिया का मतलब सक्रिय रूप से मारना नहीं, बल्कि प्राकृतिक मृत्यु होने देना है. इसमें नीचे दी गईं प्रक्रियाएं शामिल होती हैं:
- लाइफ सपोर्ट हटाना: अगर मरीज वेंटिलेटर या किसी अन्य कृत्रिम श्वसन प्रणाली पर है तो उसे बंद कर दिया जाता है.
- दवाएं रोकना: अंगों को कार्यशील रखने के लिए दी जा रही एंटीबायोटिक्स या हृदय गति बनाए रखने वाली दवाओं को बंद कर दिया जाता है.
- आर्टिफिशियल फीडिंग रोकना: नली के जरिए दिए जा रहे तरल भोजन और पानी को हटा लिया जाता है.
- इलाज रोकने के साथ-साथ यह सुनिश्चित किया जाता है कि मरीज को कोई शारीरिक कष्ट न हो, इसके लिए उसे पेनकिलर्स दिए जाते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने दिया ये और निर्देश
इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य के लिए भी एक व्यवस्था दी है. कोर्ट ने देश के सभी मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (CMO) को निर्देश दिया है कि वे ऐसे मामलों की जांच और प्रक्रिया के लिए एक विशेष 'पैनल' का गठन करें.
ये भी पढ़ें: गाजियाबाद के हरीश राणा को इच्छा मृत्यु! 13 साल से अचेत इस युवक पर फैसला सुनाते हुए भावुक हुआ सुप्रीम कोर्ट
ADVERTISEMENT









