भाजपा या सपा... 2027 में किसके साथ गठबंधन कर सकते हैं चंद्रशेखर? जनता से कर दिए ये वादे

UP Election 2027: नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद ने 'सत्ता परिवर्तन यात्रा' के जरिए 2027 विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंक दिया है. ASP प्रमुख ने सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा किया है.

UP Tak

आयशा शेख़

10 Jun 2026 (अपडेटेड: 10 Jun 2026, 01:58 PM)

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UP Vidhan Sabha Election 2027: यूपी की सियासत में नया तूफान आ सकता है है. नगीना के सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad Ravan) ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए कमर कस ली है. जून 2026 की शुरुआत में उन्होंने “सत्ता परिवर्तन यात्रा” शुरू की है. 

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अब सवाल ये है कि वो भाजपा या सपा में से किसके लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं? गठबंधन के आसार हैं या अकेले ही बड़ा खेल खेलेंगे? चंद्रशेखर ने साफ कहा है कि उनकी पार्टी यूपी की सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी. उम्मीदवारों का इंटरव्यू शुरू हो चुका है और नगीना वाला मॉडल पूरे यूपी में दोहराने की तैयारी है. इसका मतलब है कि घर-घर संपर्क, बूथ स्तर का संगठन और युवा-दलितों को जोड़ना. 

यात्रा कहां से शुरू हुई, क्या मकसद है?

सत्ता परिवर्तन यात्रा की शुरुआत बिजनौर-मेरठ इलाके से हुई. पहले चरण में पश्चिमी यूपी के कई जिलों में कार्यक्रम हो रहे हैं. महिला चौपाल, युवा सम्मेलन और किसान बैठकें... चंद्रशेखर कह रहे हैं कि ये सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि बदलाव का जनसंकल्प है. उनका टारगेट यूपी के सभी 75 जिलों में गांव-गांव जाकर युवा, दलित, किसान और महिलाओं को जोड़ना है. 

गठबंधन होगा या अकेले लड़ाई?

चंद्रशेखर ने अभी तक पूरी तरह पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन उनका रुख साफ है कि भाजपा को छोड़कर किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन के लिए तैयार हैं, लेकिन पहल दूसरी तरफ से आएगी. अभी अकेले ही पूरे दम से तैयारी चल रही है. 

समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) में दलित वोट के लिए चंद्रशेखर की जरूरत पड़ सकती है. दोनों तरफ से नरम रुख देखा जा रहा है, लेकिन अभी कोई पक्का गठबंधन नहीं हुआ है. 

बसपा के लिए भी ये यात्रा एक बड़ी चुनौती बन रही है क्योंकि चंद्रशेखर दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं. 2024 लोकसभा में नगीना से चंद्रशेखर की जबरदस्त जीत ने उन्हें नया जोश दिया है. अब वो उसी जोश को पूरे यूपी में फैलाना चाहते हैं.

युवाओं और दलितों पर दांव

चंद्रशेखर की अपील खासकर युवाओं, छात्रों और दलित समाज के एक बड़े वर्ग में है. बेरोजगारी, महंगाई और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर वो भाजपा सरकार पर हमला बोल रहे हैं. उनका अक्रामक अंदाज और सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना युवाओं को आकर्षित कर रहा है. हालांकि चुनौती भी कम नहीं है. 

सपा के साथ गठबंधन की क्या है संभावना?

अखिलेश यादव का PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला पिछले चुनाव में काफी कामयाब रहा था. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस फॉर्मूले को और मजबूत करने के लिए सपा चंद्रशेखर को अपने साथ लाना चाहती है, खासकर पश्चिमी यूपी के जाटव/दलित वोटों के लिए. 

एक बात ये भी है कि अखिलेश को कहीं न कहीं जयंत चौधरी वाला डर सता रहा है. क समय था जब जयंत चौधरी और चंद्रशेखर के रिश्ते बहुत अच्छे थे. बाद में जयंत चौधरी पाला बदलकर भाजपा के साथ चले गए. इस वजह से अखिलेश यादव को गहरा धक्का लगा. उन्हें लगा कि उन्होंने जिस नेता को आगे बढ़ाया और ताकत दी, उसने समय आने पर साथ छोड़ दिया. 

अब अखिलेश यादव चंद्रशेखर  को ज्यादा प्रमोट करने या उन्हें बड़ी ताकत देने से बच रहे हैं. हालांकि, दोनों नेताओं के बीच रिश्ते काफी सही हैं.  रिपोर्ट्स बताती हैं कि सपा के साथ पर्दे के पीछे बातचीत की संभावनाएं हमेशा खुली रहती हैं.

भाजपा को फायदा या नुकसान?

ये इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ है. चंद्रशेखर खुलकर कहते हैं कि भाजपा उनकी मुख्य सियासी दुश्मन है और वो उन्हें सत्ता से हटाना चाहते हैं, लेकिन उनका यह फैसला भाजपा के लिए वरदान भी साबित हो सकता है. कैसे? आइए हम समझाते हैं... 

  • वोटों का बिखराव : अगर चंद्रशेखर की पार्टी सभी 403 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ती है, तो वो जो भी वोट हासिल करेगी, वो ज्यादातर भाजपा-विरोधी वोट होंगे. दलित और मुस्लिम वोटों का बिखराव सीधे तौर पर भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है. इससे अखिलेश के वोट भी बंट सकते हैं. 
  • किंगमेकर बनने की चाह: चंद्रशेखर का प्लान खुद को 'किंगमेकर' की भूमिका में लाने का है, ताकि चुनाव के बाद उनके बिना सरकार न बन सके, लेकिन राजनीति में यह दांव उलटा भी पड़ सकता है.

मायावती के लिए क्यों बढ़ी टेंशन?

चंद्रशेखर की सबसे बड़ी चुनौती मायावती की बसपा से है. बसपा का कोर वोट बैंक (दलित/जाटव) अब धीरे-धीरे चंद्रशेखर के आक्रामक अंदाज की तरफ आकर्षित हो रहा है. चंद्रशेखर खुद को एक बड़े दलित चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं, जो मायावती के घटते जनाधार के बीच बसपा के लिए खतरे की घंटी है.

जनता से क्या हैं चंद्रशेखर के वादे? 

चंद्रशेखर सिर्फ जातिगत राजनीति के भरोसे नहीं हैं, उन्होंने जनता को लुभाने के लिए लोक-लुभावन वादों का एक बड़ा पिटारा (32-पॉइंट एजेंडा) खोला है... 

  • मुफ्त शिक्षा: कक्षा 1 से 12वीं तक मुफ्त और बेहतर शिक्षा. इसके अलावा, सिर्फ 1 रुपये में एमबीबीएस और इंजीनियरिंग-लॉ की पढ़ाई पूरी तरह मुफ्त करने का वादा.
  • किसानों के लिए: फसलों पर एमएसपी की कानूनी गारंटी.
  • युवाओं के लिए: रोजगार की गारंटी, पेपर लीक पर पूरी तरह रोक और खाली पड़े सरकारी पदों (बैकलॉग वैकेंसी) को तुरंत भरना.
  • महिलाओं के लिए: सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम और बेहतर स्वास्थ्य.

चंद्रशेखर आजाद के पास इस समय 'भीम आर्मी' के युवाओं का जोश है और सोशल मीडिया पर उनकी तगड़ी रीच है. संगठन के मामले में वो अभी सपा जितने मजबूत नहीं हैं, लेकिन उनका जमीनी कैंपेन कमाल का है. अगर वो अकेले लड़े तो नुकसान विपक्ष का ज्यादा और फायदा भाजपा का हो सकता है, लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है. चुनाव आते-आते गठबंधन की नई तस्वीरें भी सामने आ सकती हैं.