रामपुर उपचुनाव: तुर्कों की नाराजगी सपा और आजम खान पर पड़ेगी भारी? यहां समझिए

रामपुर उपचुनाव: तुर्कों की नाराजगी सपा और आजम खान पर पड़ेगी भारी? यहां समझिए
फोटो: अमीर खान

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में होने वाले उपचुनावों को लेकर सियासत गरम है. रामपुर (Rampur) विधानसभा में भी उपचुनाव होना हैं. इस उपचुनाव में जीत को लेकर समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) और भाजपा (BJP) अपनी पूरी ताकत लगा रही हैं. इसी बीच इन दिनों रामपुर की सियासत में तुर्क (Turkic) शब्द चर्चाओं में बना हुआ है. ऐसे में सवाल उठता है कि रामपुर विधानसभा उपचुनाव में आखिर तुर्क शब्द बार-बार चर्चाओं के केंद्र में क्यों आ रहा है. आइये आपको इसका कारण बताते हैं.

जानिए क्या है वजह

आपको बता दें कि तुर्क, मुसलमानों की ही एक बिरादरी है. ये समुदाय मुस्लिम समाज में अपनी एक अलग पहचान रखता है. तुर्क समाज को समाजवादी पार्टी का कट्टर समर्थक माना जाता है, लेकिन रामपुर विधानसभा चुनाव में इस बार तुर्क बिरादरी समाजवादी पार्टी और आजम खान (Azam Khan) से नाराज है.

बताया जाता है कि, समाजवादी पार्टी और आजम खान ने तुर्क बिरादरी के वोट तो खुब लिए लेकिन जब जगह देने की बात आई तो इस समाज को नजरअंदाज कर दिया गया. तुर्क समाज का दावा है कि इस समाज की शहर में 25 हजार तो वहीं लोकसभा क्षेत्र में ढाई लाख की आबादी है. ऐसे में मुसलमान समाज की इस बिरादरी की रामपुर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्र में अच्छी सियासी ताकत मानी जाती है.

आजम खान पड़े कमजोर

रामपुर लोकसभा और विधानसभा सीटों पर कभी आजम खान का डंका बजता था. आजम खुद कई बार रामपुर विधानसभा सीट से विधायक रहे हैं तो वह रामपुर लोकसभा सीट से सांसद भी बने हैं, लेकिन अब आजम कमजोर पड़ गए हैं. यहां तक की उनकी विधानसभा सदस्यता भी रद्द कर दी गई है. ऐसे में कभी उनके खास रहे लोग भी अब अपना सिर उठाने लगे हैं.

समाजवादी पार्टी ने रामपुर विधानसभा उपचुनाव में आसिम रजा (Asim Raja) को अपना उम्मीदवार बनाया है. मगर इस बार तुर्क समाज ने समाजवादी उम्मीदवार आसिम रजा के खिलाफ वोट देने की तैयारी कर ली है. तुर्क समाज के नेता मुन्ना मशहूर ने सबसे पहले विद्रोह का बिगुल फूंका है. माना यह भी जा रहा है कि आसिम रजा को उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर भी समाजवादी पार्टी की खिलाफत हो रही है.

तुर्की से आए थे पूर्वज

बता दें कि तुर्क समाज खुद को तुर्की से जोड़ते हैं. इनका मानना है कि इनके पुरखे तुर्की से आए थे. इनका मानना है कि मुसलमानों में जो दूसरी बिरादरी हैं उनका धर्म परिवर्तन हुआ है. तुर्क समाज खुद को दूसरे से अलग मानता है.

दरअसल सपा में टिकट के कई दावेदार थे, लेकिन आजम खान ने अपना भरोसा आसिम रजा पर जताया जिससे सपा के नेताओं में विद्रोह फैल गया. आजम खान के बेहद करीबी रहे फसाहत अली सानू ने भी बगावत करते हुए भाजपा का दामन थाम लिया. उन्होंने भाजपा का दामन थामते हुए कहा कि, अब्दुल दरी नहीं बिछाएगा बल्कि विधायक और सांसद भी बनेगा.

नहीं करेंगे आसिम रजा को वोट

तुर्क बिरादरी के जिला पंचायत अध्यक्ष मुन्ना मशहूर ने तो विधानसभा उपचुनाव लड़ने का पर्चा भी खरीद लिया था लेकिन खुद पर काबू रखते हुए उन्होंने पर्चा दाखिल नहीं किया. मगर उनके समर्थकों ने साफ कह दिया है कि वह आजम खान के करीबी आसिम रजा को वोट नहीं देंगे. ऐसे में माना जा रहा है कि तुर्क समाज इस बार सपा को वोट नहीं दे सकता है.

भाजपा को दिखी जीत की उम्मीद

आजम खान के करीबी और समाजवादी पार्टी के नेताओं में फैली बगावत को देखकर भाजपा अपनी जीत की उम्मीद लगा रही है. भाजपा को लगता है कि आजम खान और सपा नेताओं में बगावत है और सपा का वोट बैंक टूट रहा है. ऐसे में इस बार रामपुर विधानसभा चुनाव जीता जा सकता है.

अहम बिंदु

आपको यह भी बता दें कि भाजपा ने रामपुर उपचुनावों में आजम खान के विरोधी और आजम खान को सजा दिलवाने में अहम भूमिका निभाने वाले आकाश सक्सेना को मैदान में उतारा है. बताया जाता है कि पेशे से वकील आकाश सक्सेना ने आजम खान के खिलाफ 80 से अधिक मुकदमें दर्ज करवाए थे और केस की पैरवी भी वह खुद करते थे.

भाजपा को लगता है कि आजम खान और समाजवादी पार्टी से नाराज तुर्क वोट इस बार सपा को वोट नहीं देने वाला है तो वहीं फसाहत अली सानू जैसे नेताओं का समर्थन, इस बार रामपुर विधानसभा जीत भाजपा के पाले में डाल सकता है.

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