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एक फोन और शूटरों ने एक-दूसरे को मार ली गोली, 18 साल पहले संजीव जीवा मारा गया लेकिन वह जिंदा निकला

राजकुमार सिंह

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आज से 18 साल पहले यानी 2005 में भारतीय जनता पार्टी के विधायक कृष्णानंद राय को गोलियों से भून दिया गया. हत्या करने के बाद उनकी चोटी तक काट ली गई. इस हत्याकांड में भाजपा विधायक समेत 7 लोग मारे गए. कृष्णानंद राय की हत्या की साजिश रचने का आरोप मुख्तार अंसारी पर लगा और इसमें संजीव जीवा का भी नाम सामने आया. बताया जाता है कि जिस गाड़ी पर भाजपा विधायक सवार थे, उस गाड़ी की बोनट पर चढ़कर संजीव जीवा ने ही कृष्णानंद राय पर गोलियां बरसाई थी. 

मुठभेड़ में मारा गया संजीव, बाद में निकला जिंदा

दरअसल भाजपा विधायक की हत्या की साजिश घटना के 4 महीने पहले ही रची जा चुकी थी. ये बात है 26 जुलाई 2005 की. पुलिस रिकॉर्ड में ये एक ऐसी मुठभेड़ है, जिसमें जो अपराधी मारा गया, उसकी पहचान आज तक नहीं हो पाई.

दरअसल 26 जुलाई 2005 को जौनपुर कोतवाली क्षेत्र के पॉलिटेक्निक चौराहे पर चेकिंग के दौरान तत्कालीन चौकी इंचार्ज अजय मिश्रा पर फायरिंग की गई. इसके बाद पुलिस मुठभेड़ में दो बदमाशों की मौत हुई और दो बदमाश फरार हो गए. उस दौरान मारे गए एक बदमाश की पहचान विजय बहादुर सिंह के तौर पर हुई तो दूसरे बदमाश की पहचान संजीव जीवा के तौर पर हुई.  

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संजीव नहीं तो कौन था मारा गया दूसरा बदमाश

पहले पुलिस ने इसे अपनी बड़ी सफलता माना. पुलिस को लगा की खूंखार अपराधी संजीव जीवा मारा गया. मगर मुठभेड़ के 2 दिन बाद पता चला कि मारा गया दूसरा बदमाश खूंखार अपराधी संजीव जीवा नहीं है. संजीव जीवा जिंदा था. मुठभेड़ में मारे गए दूसरे बदमाश की आज तक पहचान नहीं हो पाई है.

संजीव-मुन्ना बजरंगी थे एक कार में सवार

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, जिस वाहन से यह अपराधी जा रहे थे, उसमें मुन्ना बजरंगी और संजीव जीवा भी बैठे थे. जब मुठभेड़ हुई तो ये दोनों किसी तरह से वहां से भाग निकले. माना जाता है कि सपा सरकार में हुई इस घटना को अगर पुलिस ने गंभीरता से लिया होता तो भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की जान बच सकती थी. 

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दरअसल 18 साल पहले यानी 26 जुलाई 2005 की दोपहर लगभग 2 बजे अपराधियों ने जौनपुर पुलिस पर फायरिंग कर दी और वाराणसी की तरफ भाग निकले. इस सूचना पर तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अभय प्रसाद ने अपने सभी पुलिसकर्मियों और पुलिस थानों को तत्काल अपराधियों का पीछा करने का आदेश जारी कर दिया. अपने को पुलिस से घिरा देखकर शूटरों ने अपने वाहन को हौज गांव की तरफ घुमा दिया. बरसात का मौसम होने के चलते अपराधियों का वाहन गड्ढे में फंस गया. 

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बच्ची को कब्जे में ले लिया

इस बीच कई गांव वाले वहां पहुंच गए. शूटरों ने खुद को असुरक्षित देखते हुए एक 10 साल की बच्ची को अपने कब्जे में ले लिया और गांव के एक घर में पनाह ले ली. इतनी देर में भारी संख्या में पुलिसकर्मी भी वहां आ गए. पुलिस अधिकारियों ने उन बदमाशों से आत्मसमर्पण करने की अपील की, लेकिन उन पर कोई असर नहीं दिखा. 

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एक-दूसरे को ही मार दी गोली

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, इस दौरान दोनों अपराधी मोबाइल फोन से किसी से बातचीत कर रहे थे. माना जाता है कि ये दोनों अपने आका से बात कर रहे थे. पुलिस जब तक कुछ सोच पाती इसी बीच कमरे के अंदर से गोली चलने की आवाज आई और बच्ची के रोने की भी आवाज आई. ये सुनते ही पुलिस सकते में आ गई. 

पुलिस अधीक्षक के आदेश पर कमरे की छत को तोड़कर देखा गया तो दोनों अपराधी गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर पड़े हुए थे. दोनों के माथे पर गोली लगी हुई थी. माना जाता है कि अपने आका के आदेश पर इन दोनों ने एक दूसरे को ही गोली मार दी थी और मरने से पहले सिम कार्ड मुंह में चबा गए थे. मगर राहत की बात ये थी कि बच्ची सुरक्षित थी. 

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पुलिस के लिए बना रहस्य

आनन-फानन में पुलिस ने बच्ची को सुरक्षित निकाला और बदमाशों को अस्पताल लेकर गई, जहां उनकी मौत हो गई. मारे गए बदमाशों के पोस्टमार्टम के दौरान सिम कार्ड उनकी श्वास नली में पाया गया,  जिसकी बाद में पुलिस ने जांच की. मारे गए दोनों बदमाशों में एक की शिनाख्त विजय बहादुर सिंह पुत्र इंद्र बहादुर सिंह ग्राम – बेलगढ़ा काकोरी थाना मलिहाबाद जिला लखनऊ के रूप में हुई दूसरे मृत बदमाश की शिनाख्त मौके पर मुख्तार अंसारी के खास शूटर संजीव जीवा के तौर पर हुई. मगर 2 दिन बाद पुलिस को पचा लगा कि ये मुख्तार का खास संजीव जीवा नहीं है बल्कि कोई और बदमाश है. संजीव जीवा तो जिंदा है. उसी समय यह सवाल खड़ा हो गया कि अगर ये संजीव नहीं है तो फिर कौन अपराधी है? मगर 18 साल बाद भी दूसरे अपराधी की पहचान पुलिस नहीं कर पाई. समय के साथ ये रहस्य पुलिस की फाइलों में दब गया.

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