60 प्रतिशत मुस्लिम सीट वाली कुंदरकी सीट फिर जीतेगी बीजेपी या सपा के हाथ लगेगी बाजी?

रजत सिंह

• 06:00 AM • 07 Feb 2026

Kundarki Vidhan Sabha 2027: कुंदरकी विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के चुनावी परिदृश्य में बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है. 2024 के उपचुनाव में यहां बीजेपी ने जीत हासिल की थी. लेकिन समाजवादी पार्टी के लिए यह परंपरागत सीट रही है. यहां की आबादी में मुस्लिम वोटर सबसे बड़ा हिस्सा रखते हैं जो चुनाव के नतीजे को प्रभावित करते हैं.

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Kundarki Vidhan Sabha 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुंदरकी विधानसभा सीट इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है. 2024 के उपचुनाव में जिस तरह के समीकरण यहां देखने को मिले उसने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है. एक तरफ अखिलेश यादव वोटों की चोरी का आरोप लगा रहे हैं तो दूसरी तरफ भाजपा इसे अपने नए सामाजिक प्रयोग की जीत मान रही है.

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उपचुनाव 2024: एक ऐतिहासिक उलटफेर

कुंदरकी सपा का वो मजबूत गढ़ था जहां से जियाउर रहमान बर्क विधायक थे. उनके सांसद बनने के बाद हुए उपचुनाव में जो हुआ वह किसी करिश्मे से कम नहीं था. भाजपा के ठाकुर रामवीर सिंह ने करीब डेढ़ लाख वोटों से जीत दर्ज की. समाजवादी पार्टी जिसने लोकसभा में शानदार प्रदर्शन किया था यहां अपनी जमानत तक नहीं बचा पाई. मतदान के दौरान पुलिस और प्रशासन पर गंभीर आरोप लगे. बंदूक ताने पुलिस वाले और लाइन में खड़ी महिलाओं की तस्वीरों ने खूब सुर्खियां बटोरीं.

क्या है कुंदरकी का सियासी इतिहास?

अगर उपचुनाव को अपवाद मान लें तो यह सीट पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी के पक्ष में रही है.2022 में जियाउर रहमान बर्क (सपा) जीते. 2017 और 2012 में मोहम्मद रिजवान (सपा) विजयी रहे. 2007 में अकबर हुसैन (बसपा) ने बाजी मारी.2002 में मोहम्मद रिजवान (सपा) जीते.

जातीय समीकरण

कुंदरकी की कुल आबादी में करीब 60-65% मुस्लिम मतदाता हैं. यहां का गणित अब हिंदू बनाम मुस्लिम से हटकर पिछड़ा मुसलमान बनाम सवर्ण मुसलमान की ओर मुड़ता दिख रहा है.

2027 के लिए क्या है दोनों पक्षों का दावा?

भाजपा विधायक ठाकुर रामवीर सिंह का कहना है कि वह पिछले 25 वर्षों से जनता के बीच सक्रिय हैं. उनका दावा है कि 2024 का परिणाम कोई तुक्का नहीं था बल्कि जनता के विश्वास की जीत थी जिसे वे 2027 में भी दोहराएंगे. समाजवादी पार्टी इस बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहती. पार्टी का पूरा फोकस SIR (Voter List Revision) पर है. सपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे फर्जी आपत्तियों को हटवाने और नए वोट बनवाने में जुटे हैं ताकि उपचुनाव जैसी स्थिति दोबारा न बने.

क्या कहता है जमीनी मिजाज?

स्थानीय पत्रकारों और जानकारों का मानना है कि उपचुनाव और मुख्य चुनाव के मिजाज में फर्क होता है. ग्रामीण क्षेत्रों में सपा का समर्पण अभी भी मजबूत है. हालांकि भाजपा ने मुस्लिम बाहुल्य सीट पर जीतकर एक मनोवैज्ञानिक बढ़त बना ली है. लेकिन 2027 की लड़ाई बेहद कांटे की होने वाली है.