Tanda election 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही पूर्वांचल की राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं. जिले की सबसे चर्चित और हॉट मानी जाने वाली टांडा विधानसभा सीट पर एक बार फिर पूरे प्रदेश की निगाहें टिक गई हैं. बुनकर नगरी के नाम से मशहूर इस सीट पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं. 2022 में बीजेपी की राज्यव्यापी लहर के बावजूद समाजवादी पार्टी के राममूर्ति वर्मा ने करीब 28,000 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी. अब जहां सपा अपने इस गढ़ को बचाने की जंग लड़ रही है. वहीं बीजेपी 2017 का इतिहास दोहराकर वापसी की जुगत में है. दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी अपने पारंपरिक वोट बैंक के सहारे मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की तैयारी में जुटी है.
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टांडा का सियासी इतिहास: हर चुनाव में बदला जनादेश
टांडा विधानसभा सीट का इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है.पिछले चार चुनावों के नतीजे बताते हैं कि यहाँ की जनता ने किसी एक दल को स्थायी ठेका नहीं दिया.
2007: बसपा के लालजी वर्मा ने सपा के अजीमुल्ला हक को हराकर कब्जा जमाया.
2012: सपा के अजीमुल हक ने बसपा से यह सीट छीन ली.
2017: बीजेपी की संजू देवी ने इतिहास रचते हुए सपा को शिकस्त दी और सीट भाजपा के खाते में डाली.
2022: सपा के राममूर्ति वर्मा ने बीजेपी प्रत्याशी कपिल देव वर्मा को 28,000 से अधिक वोटों से हराकर फिर से सपा का परचम लहराया.
नेताओं के दावे और रणनीतियां
मौजूदा सपा विधायक राममूर्ति वर्मा का कहना है कि विपक्ष का विधायक होने के बावजूद उन्होंने जनता के विकास और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अपनी निधि का पूरा इस्तेमाल किया है. उन्होंने बताया कि गरीब मरीजों के इलाज के लिए विधायक निधि से सहायता देने के साथ-साथ क्षेत्र में बिजली की समस्या को दूर करने के लिए हर साल 1.5 से 2 करोड़ रुपये विद्युत विभाग को दिए गए हैं. सपा को अपने मुस्लिम-ओबीसी गठबंधन और क्षेत्र में पकड़ पर पूरा भरोसा है.
बीजेपी 2017 की तर्ज पर नए सामाजिक समीकरण बनाने में जुटी है. पार्टी संगठन को मजबूत करने के लिए पिछड़े वर्ग से आने वाले दिलीप देव वर्मा को नया जिलाध्यक्ष बनाया गया है. बीजेपी कार्यकर्ताओं के दम पर और केंद्र-राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं तथा विकास परियोजनाओं के सहारे इस सीट पर वापसी का दावा कर रही है.
बसपा 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' के नारे के साथ मैदान में उतर रही है.पार्टी नेताओं का आरोप है कि विरोधी दल दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को गुमराह कर रहे हैं. बसपा का दावा है कि सपा और बीजेपी दोनों के शासनकाल को देखने के बाद अब सर्वसमाज, ब्राह्मण, मुस्लिम और अति-पिछड़ा वर्ग फिर से बसपा के साथ जुड़ रहा है.
जातीय और सामाजिक समीकरण
पूर्वांचल की अन्य सीटों की तरह टांडा में भी जातीय समीकरण बेहद अहम हैं. करीब 2,95,000 कुल मतदाताओं वाली इस सीट का मोटा गणित इस प्रकार है.
मुस्लिम मतदाता: लगभग 1,10,000 (निर्णायक भूमिका)
अनुसूचित जाति (SC): लगभग 80,000
कुर्मी (पटेल): लगभग 28,000
यादव: लगभग 16,000
वैश्य: लगभग 13,000
निषाद: लगभग 13,000
विश्वकर्मा: लगभग 8,000
कहार: लगभग 7,000
ब्राह्मण / नाई: लगभग 5,000 - 5,000
चौहान / पाल: लगभग 4,000 - 4,000
ठाकुर: लगभग 3,000
ग्राउंड रिपोर्ट और स्थानीय पत्रकारों की राय
स्थानीय विश्लेषकों का मानना है कि जिले में 2022 के आम चुनाव में सपा ने सभी 5 सीटों पर जीत हासिल की थी. हालांकि बाद में कटहरी उपचुनाव में बीजेपी को जीत मिली.
वर्तमान स्थिति
सपा का पलड़ा भारी: मजबूत मुस्लिम-यादव-ओबीसी गठजोड़ के कारण फिलहाल सपा यहां मजबूत स्थिति में दिखाई देती है.
बीजेपी की आक्रामक रणनीति: बीजेपी ने जिले में विकास योजनाओं की झड़ी लगा दी है और बैकवर्ड कार्ड खेलते हुए जिलाध्यक्ष बदला है ताकि पिछड़े और दलित वोटों में सेंध लगाई जा सके.
चुनाव अभी दूर: चुनाव में अभी समय बाकी है ऐसे में देखना होगा कि बीजेपी का यह नया दांव और विकास योजनाएं जनता को कितना रिझा पाती हैं या फिर सपा अपने इस किले को बचाए रखने में कामयाब होती है.
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