Mood kya hai Jhansi: झांसी की 4 सीटों पर क्या है माहौल? कटेंगे विधायकों के टिकट या चलेगा PDA दांव, समझिए पूरा समीकरण

Mood Kya Hai Jhansi: 2027 विधानसभा चुनाव से पहले झांसी की चारों सीटों का चुनावी माहौल, एंटी-इंकंबेंसी, जातीय समीकरण और टिकट कटने की चर्चाएं तेज हैं. जानिए स्थानीय पत्रकारों की ग्राउंड रिपोर्ट में किस दल का पलड़ा भारी नजर आ रहा है.

Mood kya hai Jhansi

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Mood Kya hai Jhansi: झांसी जिले में 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है.जिले की चारों विधानसभा सीटों-झांसी सदर, बबीना, गरौठा और मऊरानीपुर का चुनावी मिजाज और अंदरूनी समीकरण जानने के लिए यूपी Tak की विशेष सीरीज 'मूड क्या है'में स्थानीय पत्रकारों ने चर्चा की है. स्थानीय वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के साथ चर्चा में जिले के चार सीटों का पूरा चुनावी खाका, विधायकों की एंटी-इंकंबेंसी और नए जातीय समीकरणों की ग्राउंड रिपोर्ट सामने आई है.

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2027 चुनाव से पहले क्या है झांसी की 4 सीटों का मिजाज?

वर्तमान में झांसी जिले की तीन सीटों-झांसी सदर, बबीना और गरौठा पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है. जबकि मऊरानीपुर सीट पर बीजेपी की सहयोगी पार्टी अपना दल (एस) का विधायक है. 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के अनुराग शर्मा ने जीत दर्ज की थी. लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव में मुकाबला बेहद दिलचस्प और कांटे का माना जा रहा है.

वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, इस बार मुख्य मुकाबला भाजपा और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच ही रहने की संभावना है. हालांकि कई मौजूदा विधायकों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इंकंबेंसी) और दो-तीन बार से विधायक रहे नेताओं के टिकट कटने की चर्चाओं ने हलचल बढ़ा दी है.

1.झांसी सदर विधानसभा 

मौजूदा स्थिति: बीजेपी के रवि शर्मा लगातार तीन बार से विधायक हैं.

समीकरण और चुनौती: यह सीट पारंपरिक रूप से ब्राह्मण बाहुल्य मानी जाती है. रवि शर्मा का स्थानीय आधार मजबूत है. लेकिन तीन कार्यकाल पूरे होने के कारण उनके खिलाफ कुछ शिकायतें और विकल्प की मांग भी उठ रही है.

जातीय रणनीति: बीजेपी अगर किसी नए ओबीसी या कायस्थ चेहरे पर दांव लगाती है तो सपा किसी ब्राह्मण प्रत्याशी को उतार सकती है. वहीं अगर बीजेपी ब्राह्मण चेहरा ही रखती है तो सपा अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण के तहत ओबीसी उम्मीदवार ला सकती है. सपा-कांग्रेस गठबंधन की स्थिति में यह सीट कांग्रेस (जैसे पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य) के खाते में भी जाने की चर्चा है.

2.गरौठा विधानसभा 

मौजूदा स्थिति: बीजेपी के किसान नेता जवाहरलाल राजपूत दो बार से विधायक हैं.

समीकरण और चुनौती: जवाहरलाल राजपूत ने सपा के कद्दावर नेता दीप नारायण सिंह यादव को लगातार दो बार हराया है. हालांकि, पत्रकारों का मानना है कि पिछले 10 वर्षों में जनता की अपेक्षाएं पूरी न होने के कारण विधायक के खिलाफ नाराजगी है.

विकल्प: बीजेपी में गुजरात फॉर्मूले की तर्ज पर दो बार के विधायकों के टिकट कटने की चर्चा है. ऐसे में इस सीट पर पटेल या पाल समाज से नए चेहरों की दावेदारी देखी जा रही है. वहीं सपा की ओर से पूर्व विधायक दीप नारायण यादव का व्यक्तिगत प्रभाव अभी भी क्षेत्र में मजबूत माना जाता है.

3.बबीना विधानसभा 

मौजूदा स्थिति: बीजेपी के राजीव सिंह पारिछा लगातार दो बार से विधायक हैं.

समीकरण और चुनौती: बबीना में औद्योगिक विकास (बीड़ा प्रोजेक्ट) बड़ा मुद्दा है.लेकिन चुनाव पूरी तरह जातीय समीकरणों पर आधारित रहेगा. मौजूदा विधायक से जुड़े कुछ विवादों और पार्टी की किरकिरी के चलते शीर्ष नेतृत्व द्वारा उम्मीदवार बदलने की संभावनाएं जताई जा रही हैं.

मुकाबला: सपा और बसपा दोनों का इस सीट पर अतीत में प्रभाव रहा है.इसलिए इस बार जीत-हार का मार्जिन बहुत कम रहने की उम्मीद है.

4.मऊरानीपुर विधानसभा 

मौजूदा स्थिति: अनुप्रिया पटेल की पार्टी 'अपना दल (एस)' की डॉ. रश्मि आर्य यहां से विधायक हैं.

समीकरण और चुनौती: यह सुरक्षित (आरक्षित) सीट हमेशा से आमने-सामने की लड़ाई के लिए जानी जाती है. पिछले चुनाव में बीजेपी-अपना दल (एस) गठबंधन ने सपा को हराया था.इस बार देखना होगा कि यह सीट दोबारा गठबंधन में अपना दल (एस) के पास रहती है या बीजेपी खुद यहां से प्रत्याशी उतारती है.सपा भी यहां अपने नए समीकरण साधने में जुटी है.

क्या गुजरात फॉर्मूले से कटेंगे मौजूदा विधायकों के टिकट?

चर्चा के दौरान पत्रकारों ने संकेत दिया कि बीजेपी मध्य प्रदेश और गुजरात के फॉर्मूले को दोहराते हुए दो या दो से अधिक बार जीत चुके विधायकों के टिकट काटकर नए और निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को मौका दे सकती है. इससे जनता का गुस्सा (एंटी-इंकंबेंसी) कम करने और नए चेहरों को सेटल करने में मदद मिलेगी.

कुल मिलाकर 2027 का चुनाव झांसी में केवल पार्टी के सिंबल पर नहीं बल्कि सही उम्मीदवार के चयन और सटीक जातीय व सामाजिक समीकरण बैठाने पर ही निर्भर करेगा.