Bhatpar Rani Vidhan Sabha 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में देवरिया जिले की भाटपार रानी विधानसभा सीट का इतिहास बेहद खास रहा है. साल 2002 से लेकर 2017 तक चाहे राज्य में बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सरकार बनी हो, समाजवादी पार्टी (SP) का दौर रहा हो या फिर 2017 की प्रचंड 'भाजपा लहर'इस सीट पर सिर्फ एक ही परिवार का परचम लहराता रहा. वह नाम था पूर्व मंत्री स्वर्गीय कामेश्वर उपाध्याय और उनके परिवार का.
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लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जब 2022 में अखिलेश यादव ने सपा को मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया और पार्टी ने कई सीटों पर वापसी की. ठीक उसी चुनाव में कामेश्वर उपाध्याय का परिवार सपा में रहते हुए भी अपनी यह पारंपरिक सीट हार गया. 'यूपी किसका में आज बात भाटपार रानी सीट के उसी बदले हुए राजनीतिक समीकरण, 50 साल के विकास के दावों और 2027 के भावी दंगल की.
कांग्रेस से सपा तक... जब एक परिवार के नाम से जानी जाती थी भाटपार रानी
भाटपार रानी सीट पर स्वर्गीय कामेश्वर उपाध्याय की तूती बोलती थी. वे कई सरकारों में मंत्री रहे और इस सीट से लगातार चुनाव जीतते रहे.
2002: कामेश्वर उपाध्याय ने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की.
2007: कामेश्वर उपाध्याय ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत हासिल की.
2012: कामेश्वर उपाध्याय सपा के टिकट पर पुनः विधायक चुने गए.
2013 (उपचुनाव): कामेश्वर उपाध्याय के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके बेटे डॉ. आशुतोष उपाध्याय सपा के टिकट पर विधायक बने.
2017: जब पूरे प्रदेश में बीजेपी की लहर थी. तब भी सपा के टिकट पर आशुतोष उपाध्याय ने इस सीट पर कब्जा बरकरार रखा.
हालांकि, 2022 के चुनाव में इस अजेय किले में सेंध लग गई. जब बीजेपी के प्रत्याशी सभा कुंवर कुशवाहा ने आशुतोष उपाध्याय को शिकस्त देकर यह सीट भाजपा की झोली में डाल दी.
बीजेपी विधायक का दावा
मौजूदा बीजेपी विधायक सभा कुंवर कुशवाहा का कहना है कि उन्होंने 4 साल में वो काम किए हैं जो पिछले 50 सालों में नहीं हुए थे. 2027 के चुनाव पर अपना दावा ठोकते हुए विधायक सभा कुंवर कुशवाहा कहते हैं 'पिछले 50 वर्षों में यह इलाका पूरी तरह पिछड़ा हुआ था. न सड़कें थीं, न बिजली और न ही जनता के हित के साधन. जब से मैं 2022 में आया हूं, मैंने पीएससी (Primary Health Centre) का उच्चीकरण कराकर बड़े सीएचसी (Community Health Centre) का निर्माण शुरू कराया है. करीब 450 फोर-लेन, टू-लेन और गांव की सड़कों का निर्माण कराया. आगजनी से निपटने के लिए फायर स्टेशन मंजूर कराया और छोटी गंडक व खनवा नदी पर 5 पुलों का निर्माण कराया है. 50 साल के काम पर मेरा 4 साल का विकास भारी है और इसी के दम पर 2027 में दोबारा जनता आशीर्वाद देगी.'
आशुतोष उपाध्याय का पलटवार
दूसरी ओर पूर्व विधायक और सपा नेता आशुतोष उपाध्याय अपनी हार को जनादेश के बजाय बीजेपी का षड्यंत्र बताते हैं. उनका कहना है कि 'बीजेपी ने अपनी सरकार के प्रभाव, धन-बल और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके मुझे हराने का काम किया. जनता ने मुझे नहीं हराया. मुझे हर बार से 12-13 हजार अधिक वोट मिले थे. मैं पहले 61,700 वोट पाकर चुनाव जीता था और 2022 में 73,200 वोट पाकर भी हार गया. 2027 में कोई चूक नहीं होगी और हर हाल में सपा भाटपार रानी से वापसी करेगी.'
जातिगत गणित
भाटपार रानी सीट का सामाजिक ताना-बाना बेहद दिलचस्प है. एक अनुमान के मुताबिक यहाँ का जातिगत आँकड़ा कुछ इस प्रकार है.
कुशवाहा (कोइरी): 52,000 (सबसे बड़ा वोट बैंक)
दलित: 47,000
ब्राह्मण: 40,000
यादव: 40,000
मुस्लिम: 35,000
वैश्य: 35,000
क्षत्रिय: 25,000
सपा की हार की वजह
अतीत में स्वर्गीय कामेश्वर उपाध्याय ब्राह्मण, यादव, मुस्लिम, कुछ दलित और अपने व्यक्तिगत प्रभाव (स्वयं के वोट बैंक) के कॉम्बिनेशन से चुनाव जीतते रहे. लेकिन 2022 में बीजेपी ने इस सीट पर 'कुशवाहा कार्ड' खेला, जिससे सबसे बड़े वोट बैंक का बड़ा हिस्सा बीजेपी के पाले में चला गया और सपा का समीकरण बिगड़ गया.
स्थानीय पत्रकारों की राय और 2027 के नए कयास
स्थानीय पत्रकारों और विश्लेषकों का मानना है कि भाटपार रानी में मुख्य मुकाबला बीजेपी और सपा के बीच ही रहेगा. हालांकि 2027 के लिए कई नए समीकरणों की चर्चा गरम है. भाटपार रानी सीट कुशवाहा बाहुल्य है. चर्चा है कि बीजेपी इस बार अपना प्रत्याशी बदल सकती है और किसी अन्य कद्दावर नेता को उतार सकती है.
सपा का नया दांव
एक चर्चा यह भी है कि सपा आशुतोष उपाध्याय को देवरिया की ही रामपुर कारखाना विधानसभा सीट से टिकट दे सकती है और भाटपार रानी से किसी कद्दावर कुशवाहा चेहरे को मैदान में उतार सकती है. यदि सपा ऐसा प्रयोग करती है तो दोनों सीटों पर उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है.
स्थानीय मुद्दे और बदलाव की हवा
पत्रकारों के मुताबिक, इलाके में बेरोजगारी, हल्दी उद्योग (बंगरा बाजार) की अधूरी प्रतिज्ञा, बंद पड़ी चीनी मिल और किसानों की समस्याओं को लेकर जनता में अंदरूनी नाराजगी और बदलाव की सुगबुगाहट भी देखने को मिल रही है.
2027 में क्या होगा?
क्या कामेश्वर उपाध्याय का परिवार अपनी खोई हुई सियासी जमीन वापस हासिल कर पाएगा? क्या आशुतोष उपाध्याय इस कुशवाहा फैक्टर का तोड़ निकाल पाएंगे या बीजेपी अपने विकास कार्यों और जातिगत कार्ड के दम पर अपनी जीत दोहराएगी? यह तो 2027 के चुनाव नतीजे ही तय करेंगे.
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