1989 से बीजेपी नहीं हारी ये सीट, 2027 चुनाव में क्या होगा कोई बड़ा खेल?

रजत सिंह

• 11:40 AM • 28 Aug 2026

वाराणसी की शहर दक्षिणी सीट 1989 से बीजेपी का अभेद्य किला रही है. 2022 में करीबी जीत के बाद 2027 में सपा की चुनौती बढ़ी है. विकास कार्य, जातीय समीकरण और विपक्षी एकता से मुकाबला बेहद दिलचस्प होने की संभावना है.

CM Yogi And Akhilesh Yadav

CM Yogi And Akhilesh Yadav (File Photo)

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Varanasi VidhanSabha 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में वाराणसी की 'शहर दक्षिणी' विधानसभा सीट भारतीय जनता पार्टी के लिए एक ऐसा अभेद्य किला रही है जिसे पार्टी 1989 से लेकर आज तक कभी नहीं हारी. हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में जीत का अंतर इतना कम हो गया कि एक वक्त लगा कि यह सीट बीजेपी के हाथ से निकल सकती है. आखिरकार बीजेपी के डॉ. नीलकंठ तिवारी ने जीत दर्ज की.लेकिन इस नजदीकी मुकाबले ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए नए सियासी समीकरण खड़े कर दिए हैं. 'यूपी किसका' में आज बात वाराणसी के इसी सबसे चर्चित और ऐतिहासिक सियासी गढ़ की.

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बीजेपी की पारंपरिक सीट का इतिहास

वाराणसी की शहर दक्षिणी विधानसभा बनारस का वह केंद्र है जिसे काशी का हृदय स्थल माना जाता है. 1989 से लगातार श्यामदेव राय चौधरी उर्फ 'दादा' इस सीट से चुनाव जीतते आ रहे थे. उनके बाद 2017 और 2022 में बीजेपी के डॉ. नीलकंठ तिवारी ने इस विरासत को आगे बढ़ाया.

काशी का यह इलाका बंगाली, ब्राह्मण और वैश्य मतदाताओं की मजबूत मौजूदगी वाला माना जाता है. यही सामाजिक ताना-बाना लंबे समय से बीजेपी की जीत की मुख्य कुंजी रहा है.

17000 करोड़ का विकास कार्य

2027 के चुनाव पर बात करते हुए वर्तमान विधायक और पूर्व मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नजर आते हैं. उन्होंने अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाते हुए बताया.

इंफ्रास्ट्रक्चर और सुंदरीकरण: दक्षिणी विधानसभा में 17,000 करोड़ रुपये के विकास कार्य हुए हैं. घाटों का निर्मलीकरण, सुंदरीकरण, श्री विश्वनाथ धाम का विकास और दालमंडी सड़क का सुंदरीकरण व चौड़ीकरण का काम जारी है.

सांस्कृतिक और बुनियादी बदलाव: बिजली, पानी और सीवर जैसी पुरानी समस्याओं को खत्म कर सभी वार्डों और गलियों को स्मार्ट बनाया गया है. लगभग 700 से अधिक अंतर्ग्रह परिक्रमा के आध्यात्मिक केंद्रों और संगीत घरानों का जीर्णोद्धार हुआ है.

स्वास्थ्य सुविधाएं: 150 साल पुराने ऐतिहासिक शिव प्रसाद गुप्त मंडलीय अस्पताल को सात मंजिला सुपर स्पेशलिटी भवन में बदला जा रहा है जिसकी छत पर एयर एम्बुलेंस लैंडिंग प्रस्तावित है. साथ ही महिला अस्पताल में MNSU का निर्माण और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को अपने नए भवन दिए गए हैं.

नीलकंठ तिवारी का दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में हुए इन ऐतिहासिक कामों के दम पर 2027 में भी बीजेपी संगठन के बल पर ऐतिहासिक जीत दर्ज करेगी.

'2022 में साजिशन हराया गया'

2022 के चुनाव में नीलकंठ तिवारी को कड़ी टक्कर देने वाले सपा-कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी किशन दीक्षित का दावा कुछ अलग है. उनका कहना है कि 2022 में जनता ने उन्हें पूरा जनादेश दिया था. लेकिन कुछ गड़बड़ियों के कारण वे चुनाव हारे.

किशन दीक्षित के मुताबिक 'इस बार सपा कार्यकर्ता केवल जमीन पर काम ही नहीं कर रहे हैं बल्कि पोलिंग बूथ, मतपेटियों और काउंटिंग स्टेशन की पूरी सतर्कता से रक्षा करेंगे ताकि किसी गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे. वे लगातार डोर-टू-डोर जनसंपर्क में हैं और जनता के बीच बने हुए हैं. उनका दावा है कि इस बार वाराणसी की जनता अपना असली जनादेश परिणाम के रूप में सामने लाएगी.

जातीय समीकरण और 2027 की संभावित चुनौतियां

शहर दक्षिणी सीट के अगर अनुमानित सामाजिक आंकड़ों पर नजर डालें तो 

मुस्लिम: 44,000

ब्राह्मण: 28,000

वैश्य: 22,000

यादव: 19,000

क्षत्रिय: 19,000

कायस्थ: 13,000

अन्य (कुर्मी, कुशवाहा, बंगाली) 

अगर मुस्लिम वोटों के एकतरफा ध्रुवीकरण को छोड़ दें तो बाकी गैर-मुस्लिम वोट बैंक बीजेपी के पक्ष में गोलबंद होता रहा है. हालांकि स्थानीय पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव आसान नहीं होगा.

विश्लेषकों के अनुसार अगर 2024 के लोकसभा चुनाव की तर्ज पर सपा और कांग्रेस का विपक्षी गठबंधन एकजुट होकर चुनाव लड़ता है और युवाओं व छात्रों का आक्रोश चुनाव पर हावी होता है तो विकास के दावों के बीच बीजेपी को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है. फिर भी पारंपरिक गढ़ होने के कारण बीजेपी की पकड़ को ढहाना विपक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.