शामली में क्या मुस्लिम वोट ले पाएंगे जयंत चौधरी? समझिए पूरा समीकरण

रजत सिंह

21 Aug 2026 (अपडेटेड: 21 Aug 2026, 01:14 PM)

UP Kiska: शामली में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सियासी समीकरण बदल गए हैं. आरएलडी-बीजेपी गठबंधन के सामने सपा की चुनौती, जाट-मुस्लिम वोट बैंक, दलित और ओबीसी मतदाताओं की गोलबंदी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है. जानिए शामली का पूरा सियासी गणित.

Jayant Chaudhary

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Shamli Vidhan Sabha 2027: उत्तर प्रदेश के पश्चिमी यूपी की सबसे चर्चित विधानसभा सीटों में शुमार शामली का सियासी गणित हमेशा से ही बेहद दिलचस्प और उतार-चढ़ाव भरा रहा है. यह एक ऐसी विधानसभा सीट है जहां जाट और मुस्लिम मतदाता जब भी एक साथ गोलबंद हुए हैं, चुनाव का पासा पलट गया है. 2022 के चुनाव में जब राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) और समाजवादी पार्टी (सपा) का गठबंधन था तो आरएलडी के प्रसन्न कुमार चौधरी ने यहां से जीत दर्ज की थी. लेकिन अब 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सियासी समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं. आरएलडी अब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ गठबंधन में है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी-आरएलडी का यह नया गठजोड़ सामली की बाजी आसानी से जीत लेगा या मुस्लिम, दलित और अन्य ओबीसी मतदाताओं की गोलबंदी सपा के लिए नए रास्ते खोलेगी?

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जातीय गणित और मतदाताओं का आंकड़ा

शामली विधानसभा में कुल करीब 3 लाख मतदाता हैं. इनमें लगभग 70,000 जाट और करीब 70,000 से 80,000 मुस्लिम मतदाता हैं जो चुनाव के नतीजे तय करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं. इसके अलावा करीब 45,000 दलित, 30,000 से 35,000 वैश्य (व्यापारी वर्ग), 25,000 कश्यप, 20,000 गुर्जर और लगभग 12,000 ब्राह्मण मतदाता हैं.

बदलते गठबंधनों का सियासी इतिहास

2012 में इस सीट से कांग्रेस के पंकज मलिक विधायक चुने गए थे. 2017 में जब आरएलडी और सपा अलग-अलग चुनाव लड़े तो भाजपा के तेजेंद्र निरवाल ने यहां से जीत हासिल की. वहीं 2022 में सपा-आरएलडी गठबंधन के तहत प्रसन्न कुमार चौधरी महज करीब 7,000 वोटों के नजदीकी अंतर से चुनाव जीते थे.

वर्तमान विधायक प्रसन्न चौधरी का दावा

वर्तमान आरएलडी विधायक प्रसन्न चौधरी का मानना है कि भाजपा और आरएलडी का गठबंधन होने के बाद अब सामली में उनका कोई मुकाबला ही नहीं है. उनका कहना है कि चौधरी चरण सिंह की विचारधारा के तहत वे हर समाज चाहे मुस्लिम हों, हिंदू हों, एससी, वैश्य, ब्राह्मण या कश्यप सभी के बीच जाते हैं और उन्हें हर वर्ग का पूर्ण समर्थन मिल रहा है.

स्थानीय पत्रकारों का विश्लेषण और नया समीकरण

स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आरएलडी के भाजपा के साथ जाने से जाट वोट बैंक तो पूरी तरह एनडीए गठबंधन के साथ शिफ्ट हो सकता है.लेकिन मुस्लिम मतदाता प्रसन्ना चौधरी से छिटक सकते हैं.

अगर मुस्लिम वोट छिटकता है: तो भाजपा-आरएलडी गठबंधन को इसकी भरपाई के लिए जाट वोटों के साथ-साथ वैश्य (30 हजार), गुर्जर (20 हजार), कश्यप (25 हजार) और ब्राह्मण (12 हजार) मतदाताओं का एकजुट समर्थन चाहिए होगा.

विपक्ष की रणनीति: दूसरी ओर अगर समाजवादी पार्टी मुस्लिम, दलित और गैर-जाट ओबीसी वोटों को साधने में कामयाब रहती है तो शामली में मुकाबला एक बार फिर बेहद कांटे का हो सकता है. फिलहाल सपा से पूर्व विधायक राजेश्वर बंसल के पुत्र अखिल बंसल की दावेदारी की चर्चा है.
 

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