Mood Kya Hai Kanpur Dehat: कानपुर देहात में बीजेपी के सामने 2027 में क्या हैं मुश्किलें, पत्रकारों ने बता दिया

तनुज अवस्थी

• 05:47 PM • 19 Aug 2026

Mood Kya Hai Kanpur Dehat: कानपुर देहात में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के सामने चुनौती बढ़ती दिख रही है. बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली, विकास की कमी, गुटबाजी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों के बीच सपा-बीजेपी मुकाबले और बसपा फैक्टर से सियासी समीकरण बदल रहे हैं.

Mood Kya Hai Kanpur Dehat

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Mood Kya Hai Kanpur Dehat: उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले में आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं. साल 2022 के चुनाव में जिले की चारों विधानसभा सीटों पर कब्जा जमाने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए इस बार की राह उतनी आसान नहीं दिख रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में तीन विधानसभा क्षेत्रों में मिली हार के बाद समीकरण बदले हैं. स्थानीय जनप्रतिनिधियों का जिले में निवास न करना, इंडस्ट्रियल एरिया होने के बावजूद बेरोजगारी, मेडिकल कॉलेज और स्वास्थ्य सेवाओं में बदहाली तथा गुटबाजी व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे 2027 के चुनाव में हावी रहने वाले हैं.

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कानपुर देहात के वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जिले का राजनीतिक माहौल कई प्रमुख समस्याओं और समीकरणों के इर्द-गिर्द घूम रहा है.

जनप्रतिनिधियों का बाहरी निवास व विकास का अभाव: जिले की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि चार विधायक, तीन एमएलसी और चार सांसद (विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों से) होने के बावजूद अधिकांश जनप्रतिनिधि कानपुर देहात में न रहकर बगल के कानपुर नगर में निवास करते हैं. इसके चलते वे स्थानीय समस्याओं से कटे रहते हैं. रसूलाबाद जैसी विधानसभा में आजादी के बाद से अब तक एक पुल न बनने से ग्रामीण 15 किमी का चक्कर काटने या लकड़ी के पुल से गुजरने को मजबूर हैं.

स्वास्थ्य, शिक्षा और बेरोजगारी मुख्य मुद्दा: नेरोलैक, अमूल और पेप्सी जैसी बड़ी कंपनियों और तीन-तीन औद्योगिक क्षेत्र (इंडस्ट्रियल एरिया) होने के बाद भी स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहा है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में नया मेडिकल कॉलेज तो खुला.लेकिन बदहाली और सुविधाओं की कमी के कारण गंभीर हादसों या एक्सीडेंट के वक्त मरीजों के पास रेफर होने या जान गंवाने के अलावा विकल्प नहीं बचता.

भाजपा और सपा दोनों खेमों में गुटबाजी: भाजपा में जिला अध्यक्ष और अकबरपुर-रनिया से विधायक प्रतिभा शुक्ला के गुटों में खींचतान बनी हुई है. वहीं स्थानीय अधिकारी भी जनप्रतिनिधियों की अनदेखी कर रहे हैं.दूसरी ओर समाजवादी पार्टी में भी जिला अध्यक्ष और अन्य नेताओं के बीच गुटबाजी साफ नजर आ रही है.

2024 के लोकसभा चुनाव का असर और त्रिकोणीय मुकाबला: 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के पीडीए (PDA) फार्मूले ने भाजपा को बड़ा झटका दिया जहां भाजपा चार में से तीन विधानसभा क्षेत्रों में पीछे छूट गई. आगामी चुनाव में सपा और भाजपा के बीच सीधी टक्कर मानी जा रही है. हालांकि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) द्वारा सिकंदरा से अरुण कटिहार और अकबरपुर-रनिया (सदर) से गुड्डन सिंह को प्रत्याशी घोषित करने से कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला और क्रॉस वोटिंग के आसार भी बन रहे हैं.

कुल मिलाकर 2027 का चुनाव केवल जातीय समीकरणों पर ही नहीं बल्कि विकास, रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे धरातली मुद्दों पर लड़ा जाएगा जहां जनता जनप्रतिनिधियों के कामकाज का हिसाब मांगने की तैयारी में है.

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