क्या बेबी रानी जीत पाएंगी अपनी सीट, जानिए आगरा ग्रामीण सीट की पूरी सियासत और 2027 का समीकरण

रजत सिंह

• 03:13 PM • 18 Aug 2026

आगरा ग्रामीण सीट पर 2027 चुनाव से पहले सियासी समीकरण बदल रहे हैं. बेबी रानी मौर्य की वापसी, जाटव-जाट वोट और बीजेपी-RLD गठबंधन के बीच टिकट को लेकर मुकाबला दिलचस्प हो गया है. जानिए सीट का जातीय गणित और चुनावी समीकरण.

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Agra Rural Vidhan Sabha 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई सीटें अपने राजनीतिक कद और दिलचस्प समीकरणों के लिए जानी जाती हैं. लेकिन पश्चिमी यूपी की आगरा ग्रामीण विधानसभा सीट का किस्सा थोड़ा अलग है. यह एक ऐसी हाई-प्रोफाइल सीट है जहां से तत्कालीन राज्यपाल (उत्तराखंड) के पद से इस्तीफा देकर आईं वरिष्ठ भाजपा नेता बेबी रानी मौर्य ने चुनाव लड़ा और रिकॉर्ड 77,000 से अधिक मतों से बड़ी जीत दर्ज की.

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मंत्रिमंडल विस्तार से लेकर सरकार के गठन तक, जब भी राज्य में दलित समुदाय से डिप्टी सीएम बनाने की चर्चा तेज होती है, तब-तब कैबिनेट मंत्री बेबी रानी मौर्य का नाम सबसे ऊपर उछलता है. हालांकि उन्हें उपमुख्यमंत्री का पद तो नहीं मिला लेकिन अब चर्चा इस बात की है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी उन्हें इस सीट से फिर रिपीट करेगी?

आगरा को 'कर्व' की तरह घेरती है यह सीट

आगरा ग्रामीण विधानसभा सीट की भौगोलिक बनावट बेहद अनोखी है. यह सीट आगरा महानगर के चारों तरफ बिल्कुल एक 'कर्व' (आर्च) की तरह घूमती हुई शहरी क्षेत्र के सबसे करीब बनी हुई है.

2012 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई इस सीट का अब तक का इतिहास इस प्रकार रहा है.

2012: परिसीमन के बाद हुए पहले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के कालीचरण सुमन ने जीत दर्ज की थी.

2017: बीजेपी की हेमलता दिवाकर ने बसपा से यह सीट छीन ली.

2022: उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल बेबी रानी मौर्य बीजेपी के टिकट पर उतरीं और रिकॉर्ड ~77,000 वोटों के बड़े अंतर से चुनाव जीता.

वोटर लिस्ट (SIR) और फर्जी वोटों को लेकर छिड़ा घमासान

2027 के चुनाव से पहले सीट पर मतदाता सूचियों (SIR) के पुनरीक्षण को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं.

बीजेपी का दावा: बीजेपी का मानना है कि फर्जी मतदाता (फेक वोट) कटने से केवल उन वोटों की छंटनी हुई है जो पोलिंग बूथ तक नहीं जाते थे. अब फॉर्म नंबर-6 के जरिए वास्तविक युवा और योग्य मतदाताओं के नाम जोड़े गए हैं जिससे भाजपा के वोट प्रतिशत में इजाफा ही होगा. बूथ समिति और पन्ना प्रमुख लगातार सक्रिय हैं.

विपक्ष का आरोप: वहीं विपक्षी दलों का आरोप है कि वोट छांटने के नाम पर एक ही परिवार के कई वैध मतदाताओं (माता-पिता, बच्चों) के नाम बेवजह काट दिए गए हैं. विपक्षी दल अपने स्तर पर कार्यकर्ताओं और प्रधानों के जरिए जातिगत जनगणना और सर्वे करा रहे हैं ताकि टिकट बंटवारे और चुनाव रणनीति को सही तरीके से अंजाम दिया जा सके.

जातीय गणित: जहां छिपी है जीत की कुंजी

आगरा ग्रामीण सीट पर दलित (विशेषकर जाटव) वोट बैंक सबसे निर्णायक भूमिका में रहता है. यही वजह है कि बीजेपी के लिए जाटव समुदाय का बड़ा चेहरा मानी जाने वाली बेबी रानी मौर्य सबसे मजबूत प्रत्याशी बनकर उभरी थीं.

जातीय आंकड़े

जाटव: 80,000

जाट: 60,000

ब्राह्मण: 50,000

लोधी: 30,000

यादव: 25,000

बघेल: 20,000

ठाकुर: 20,000

कुशवाहा: 15,000

बीजेपी को इस सीट पर जाटव और जाट वोटों के साथ-साथ पारंपरिक कोर वोट बैंक (ब्राह्मण, ठाकुर, लोधी, बघेल) का मजबूत गठजोड़ मिलता है. बसपा अगर जाटव वोटों में सेंध लगाती है तो मुकाबला त्रिकोणीय हो जाता है.

RLD-बीजेपी गठबंधन से बदला 2027 का खेल?

स्थानीय पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, 'भाजपा का कैडर और संगठन अन्य दलों के मुकाबले ग्राउंड पर काफी मजबूत है.'

आरएलडी फैक्टर: 2022 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल (RLD) मिलकर चुनाव लड़े थे और तीसरे नंबर पर रहे थे. उस वक्त गठबंधन प्रत्याशी को करीब 20% वोट मिले थे. अब चूंकि आरएलडी, बीजेपी के साथ एनडीए (NDA) में शामिल है, इसलिए जाट मतदाताओं का बड़ा हिस्सा बीजेपी के पाले में जाने से समीकरण और मजबूत दिख रहे हैं.

प्रत्याशी को लेकर एंटी-इन्कंबेंसी: स्थानीय स्तर पर कुछ हद तक विधायक/प्रत्याशी से जनता की नाराजगी की बातें भी सामने आई हैं. अगर बीजेपी प्रत्याशी के खिलाफ किसी तरह का असंतोष दूर कर लेती है तो उसकी स्थिति बेहद मजबूत रहेगी.

ऐसे में सवाल यह है कि क्या बीजेपी बेबी रानी मौर्य जैसे हैवीवेट चेहरे पर ही दांव जारी रखेगी या आरएलडी इस सीट पर अपना दावा ठोकेगी? 2027 का ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका फैसला आने वाले वक्त के सियासी दांव-पेच तय करेंगे.

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