Dumariyaganj Assembly Seat 2027: सिद्धार्थनगर की डुमरियागंज सीट पर चुनावी बिसात बिछ चुकी है. वर्तमान सपा विधायक सैयदा खातून अपने विकास कार्यों के दम पर दोबारा जीत का दावा कर रही हैं. वहीं पूर्व विधायक और भाजपा नेता राघवेंद्र प्रताप सिंह अपनी पिछली हार को एक 'धोखा' बताकर जनता के बीच संवाद के जरिए वापसी की कोशिश में जुटे हैं. जातीय आंकड़ों और ध्रुवीकरण की राजनीति के बीच इस सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय होने के आसार भी नजर आ रहे हैं.
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विधायक सैयदा खातून के विकास के दावे
समाजवादी पार्टी की विधायक सैयदा खातून का कहना है कि उन्होंने बिना भेदभाव के क्षेत्र का विकास किया है. उनके मुताबिक डुमरियागंज और लटेरा हॉस्पिटल का कायाकल्प कराया गया है, जहां अब डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित है. खराब पड़े बस स्टॉप का नवीनीकरण कराया और शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिकता से काम किया. क्षेत्र की जनता की मदद के लिए लगभग 6-7 करोड़ रुपये के सहायता पत्र लिखे हैं. विधायक का दावा है कि उनकी "सबकी मदद" वाली छवि 2027 में उन्हें फिर से जीत दिलाएगी.
राघवेंद्र प्रताप सिंह का 'वापसी' वाला प्लान
दूसरी ओर बीजेपी के राघवेंद्र प्रताप सिंह 2022 की हार को पीछे छोड़ निरंतर जनसंपर्क में जुटे हैं. उनका कहना है कि पिछली बार पैसे के बल पर उन्हें हरवाया गया. लेकिन अब जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है. राघवेंद्र कहते हैं, 'मैं विधायक नहीं हूं, फिर भी जनता के सुख-दुख में साथ खड़ा हूं. इस बार हम बड़े अंतर से जीतेंगे क्योंकि जो लोग भ्रमित हो गए थे, वे अब हमारे साथ हैं.'
चुनावी समीकरण: किसका पलड़ा भारी?
डुमरियागंज का चुनावी गणित जातीय आंकड़ों पर टिका है.
मुस्लिम: 1.40 लाख (सबसे अधिक)
दलित: 65 हजार
ब्राह्मण: 60 हजार
यादव: 40 हजार
कुर्मी: 25 हजार
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चुनाव 'हिंदू बनाम मुस्लिम' के ध्रुवीकरण पर जाता है, तो भाजपा को सीधा लाभ मिलता है. लेकिन यदि सपा मुस्लिम वोटों के साथ हिंदू वोटों (खासकर यादव और कुछ अन्य पिछड़ा वर्ग) में सेंध लगाने में सफल रहती है, तो पलड़ा साइकिल की तरफ झुक जाता है.
पत्रकारों की राय
स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, वर्तमान में मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच ही दिख रहा है. लेकिन बसपा की भूमिका अहम हो सकती है. अगर बसपा किसी मजबूत प्रत्याशी को उतारती है, तो मुकाबला त्रिकोणीय हो जाएगा. कुछ पत्रकारों का मानना है कि सत्ता विरोधी लहर भाजपा के लिए चुनौती होगी. लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा का पलड़ा थोड़ा भारी नजर आ रहा है.
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