बलिया की इस सीट पर सपा का है कब्जा, क्या 2027 में जीत पाएगी बीजेपी?

रजत सिंह

• 05:46 PM • 17 Jul 2026

UP Kiska: बलिया की सिकंदरपुर विधानसभा सीट पर 2027 चुनाव से पहले सपा और बीजेपी के बीच सियासी मुकाबला तेज हो गया है. जातीय समीकरण, पीडीए फैक्टर, एंटी-इंकंबेंसी और स्थानीय मुद्दे इस सीट की चुनावी दिशा तय करेंगे.

Akhilesh Yadav and CM Yogi

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Sikandarpur Vidhansabha 2027: उत्तर प्रदेश की सियासत में बलिया जिले की सिकंदरपुर विधानसभा सीट हमेशा से बेहद दिलचस्प रही है. यह एक ऐसी पारंपरिक सीट मानी जाती है जहां समाजवादी पार्टी (सपा) भारतीय जनता पार्टी (BJP) के मुकाबले काफी मजबूत स्थिति में नजर आती है. वर्तमान में यहां से सपा के कद्दावर मुस्लिम चेहरे जियाउद्दीन रिजवी विधायक हैं, जो यहां से तीन बार चुनाव जीत चुके हैं. साल 2017 की प्रचंड भाजपा लहर में भले ही यह सीट सपा के हाथ से निकल गई थी. लेकिन 2022 में सपा ने यहाँ फिर से जोरदार वापसी की. साल 2027 के महामुकाबले को लेकर 'यूपी किसका' में आज हम समझेंगे सिकंदरपुर का वो जातीय गणित और जमीनी हकीकत जिसने दोनों दलों के बीच सियासी तपिश बढ़ा दी है.

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जियाउद्दीन रिजवी ने क्या बताया

सपा विधायक जियाउद्दीन रिजवी अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं. यूपी Tak से बात करते हुए उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान किए गए धार्मिक और विकास कार्यों को गिनाया. रिजवी ने कहा 'जनता मुझे मेरे काम पर वोट देगी. जब मुलायम सिंह जी की सरकार थी, तब मैंने परियोजना बनाकर बलंडीनाथ जी के मंदिर को बचाया, मोनिया बाबा का आश्रम सुरक्षित किया और खाकी बाबा का मंदिर बनवाया. हमने सिसोटार में श्रीकृष्ण मंदिर का जीर्णोद्धार भी कराया. जनता जानती है कि जब रिजवी रहता है, तो क्षेत्र में बड़े विकास कार्य होते हैं. योगी सरकार में कोई काम नहीं हुआ. आज पीडीए (PDA) के लोग एकजुट होकर हमारे साथ हैं और 2027 में फिर अखिलेश यादव के नेतृत्व में सरकार बनेगी.' उन्होंने यह भी वादा किया कि उत्सा में बन रहा 100 बेड का अस्पताल एक साल के भीतर बनकर तैयार हो जाएगा.

चार साल घर पर बैठे रहे विधायक, जनता परेशान- संजय यादव 

दूसरी तरफ साल 2017 में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतने वाले और पिछले चुनाव में रनर-अप रहे पूर्व विधायक संजय यादव ने मौजूदा विधायक पर तीखा हमला बोला है. संजय यादव ने कहा 'हमारी भाजपा सरकार विकास के लिए हर विधायक की मदद को तैयार रहती है. लेकिन मौजूदा विधायक 2022 में सिर्फ समीकरणों के चलते जीत गए. पिछले चार-साढ़े चार साल से वह अपने घर पर बैठे रहे. जब भी जनता अपनी समस्याएं लेकर उनके पास जाती है तो वह (जियाउद्दीन रिजवी) 'मेरी सरकार नहीं है, अधिकारी नहीं सुन रहे' कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं. उन्होंने जनता की कोई सुध नहीं ली. इसलिए इस बार जनता उन्हें सबक सिखाएगी और भाजपा भारी बहुमत से जीतेगी.'

सिकंदरपुर सीट का क्या है जातीय गणित?

सिकंदरपुर सीट पर समाजवादी पार्टी की मजबूती की सबसे बड़ी वजह यहां का सामाजिक और जातीय समीकरण है. एक अनुमान के मुताबिक, यहां की आबादी का गणित कुछ इस प्रकार है.

दलित समुदाय: लगभग 55,000 (सबसे निर्णायक)

क्षत्रिय (ठाकुर): लगभग 30,000

यादव: लगभग 25,000

राजभर: लगभग 25,000

मुस्लिम: लगभग 25,000

ब्राह्मण: लगभग 16,000

भूमिहार: लगभग 15,000

सपा का प्लस पॉइंट: यहां यादव, मुस्लिम, राजभर और दलित (पीडीए) का एक बड़ा हिस्सा जब एक साथ आता है, तो समीकरण पूरी तरह सपा के पक्ष में झुक जाता है. साल 2022 में जियाउद्दीन रिजवी को ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा के साथ गठबंधन का भी सीधा फायदा मिला था. वहीं भाजपा ने संजय यादव को मैदान में उतारकर सपा के कोर यादव वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की थी.

ग्राउंड जीरो पर क्या है स्थानीय पत्रकारों की राय?

2027 के माहौल को समझने के लिए जब स्थानीय वरिष्ठ पत्रकारों से बात की गई, तो उनकी राय में भी विभाजन देखने को मिला.

पहले पत्रकार का विश्लेषण: 'इस बार यहां भाजपा भारी दिखाई दे रही है. सपा विधायक ने पिछले साढ़े चार साल में सिर्फ यही रोना रोया कि उनकी सरकार नहीं है और वह जनता के कामों से पल्ला झाड़ते रहे. जनता इस बार खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है, इसलिए बदलाव तय है.'

दूसरे पत्रकार का विश्लेषण: 'पिछली बार भाजपा के हारने का मुख्य कारण उनके भीतर की अंदरूनी गुटबाजी और अंतर्कलह थी, जिसका फायदा उठाकर यादव और मुस्लिम वोट पूरी तरह सपा के पक्ष में सेटल हो गए. अगर 2027 में भाजपा ने किसी नए और दमदार स्थानीय चेहरे को टिकट नहीं दिया, तो जियाउद्दीन रिजवी के लिए यह 'नेट गोल' यानी बेहद आसान जीत होगी, क्योंकि पीडीए की लहर और मौजूदा समीकरण सपा के पाले में हैं.'

दावों के बीच फंसा सिकंदरपुर का ताज

सिकंदरपुर सीट पर एक तरफ जहां सपा विधायक अपने पुराने संबंधों, धार्मिक विकास कार्यों और मजबूत 'एमवाईडी-राजभर' (MYD + Rajbhar) समीकरण के भरोसे है. वहीं भाजपा सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इंकंबेंसी) और विधायक की निष्क्रियता को मुद्दा बनाकर वापसी की तैयारी में है. अब देखना होगा कि 2027 में सिकंदरपुर की जनता रिजवी साहब की हैट्रिक लगवाती है या फिर बीजेपी इस किले को ढहाने में कामयाब होती है.