Bhogaon VidhanSabha 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में मैनपुरी का जिक्र आते ही दिमाग में समाजवादी पार्टी का नाम सबसे पहले सामने आता है. यहां मुलायम सिंह यादव से लेकर वर्तमान सांसद डिंपल यादव तक का एकछत्र राज रहा है. यह वो इलाका है जहां यादव परिवार का सियासी सिक्का चलता है. लेकिन जब बात विधानसभा चुनाव की आती है तो इसी जिले की एक ऐसी सीट भी है जो सपा को बड़ा झटका देती रही है. नाम है भोगांव विधानसभा सीट. 'यूपी किसका' में आज बात उसी भोगांव सीट की जहां कभी बीजेपी के फायरब्रांड नेता साक्षी महाराज की जमानत जब्त कराने वाली सपा आज पिछले दो चुनावों से अपनी जीत का इंतजार कर रही है. आइए समझते हैं कि आखिर इस सीट पर ऐसा क्या है जो सपा के मजबूत किले में भी बीजेपी सेंध लगाने में कामयाब हो जाती है.
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कभी चारों सीटों पर था कब्जा अब दो बार से मिल रही शिकस्त
एक दौर था जब मैनपुरी जिले की चारों की चारों विधानसभा सीटों पर समाजवादी पार्टी का एकतरफा कब्जा हुआ करता था. मुलायम सिंह यादव के अपने खास सामाजिक समीकरण थे और भोगांव सीट भी सपा का मजबूत गढ़ मानी जाती थी. लेकिन साल 2017 की मोदी ल के बाद से यहां की सियासी हवा ऐसी बदली कि सपा दोबारा वापसी नहीं कर पाई है. 2017 और फिर 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को शिकस्त देकर बीजेपी के रामनरेश अग्निहोत्री यहां से विधायक चुने गए और वह योगी सरकार के पिछले कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री भी रहे. सपा की तरफ से आलोक शाक्य यहां लगातार किस्मत आजमा रहे हैं. लेकिन फिलहाल उन्हें जीत नसीब नहीं हो रही है.
दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे
चुनाव को लेकर दोनों दलों के नेताओं की अपनी-अपनी रणनीतियां और दावे हैं.
रामनरेश अग्निहोत्री (बीजेपी विधायक): उनका साफ कहना है कि 'हमारा एकमात्र नारा सबका साथ-सबका विकास और सबका विश्वास है. केंद्र और प्रदेश की बीजेपी सरकारों का मुख्य एजेंडा केवल विकास और इलाके में अमन-चैन, शांति बनाए रखना है. जनता इसी पर मुहर लगा रही है.'
आलोक शाक्य (सपा नेता): उन्हें उम्मीद है कि 2022 जैसी गलती 2027 में नहीं होगी. उन्होंने दावा किया कि "इस बार सपा के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का जादू पूरी तरह चलेगा. जिस तरह से हम जमीन पर टारगेट करके काम कर रहे हैं उसका फायदा मिलेगा और 2027 में मैनपुरी की चारों सीटें फिर से सपा के पाले में होंगी.'
भोगांव का जातीय गणित
भोगांव सीट पर समाजवादी पार्टी के पीछे छूटने और बीजेपी के आगे बढ़ने की सबसे बड़ी वजह यहां का बदला हुआ गैर-यादव ओबीसीवोटबैंक है जो अब बीजेपी के पाले में मजबूती से खड़ा है. एक अनुमान के मुताबिक, इस सीट के जातीय समीकरण कुछ इस प्रकार हैं.
लोध मतदाता: करीब 70,000 (सबसे निर्णायक संख्या)
दलित मतदाता: करीब 54,000
शाक्य मतदाता: करीब 46,000
क्षत्रिय (ठाकुर): करीब 42,000
यादव मतदाता: करीब 35,000
ब्राह्मण मतदाता: करीब 23,000
मुस्लिम मतदाता: करीब 20,000
जब इस सीट पर शाक्य, लोध, ठाकुर और ब्राह्मण मतदाताओं का कॉम्बिनेशन बनता है तो बीजेपी को यहां एकतरफा बढ़त मिल जाती है और सपा का मुख्य कोर वोटबैंक (यादव-मुस्लिम) छोटा पड़ जाता है.
स्थानीय पत्रकारों का विश्लेषण
भोगांव के सियासी मिजाज को समझने के लिए जब स्थानीय पत्रकारों से बात की गई तो उनका कहना था कि मुख्य मुकाबला केवल सपा और भाजपा के बीच ही सीमित है. यहां किसी तीसरी पार्टी के लिए कोई वजूद नहीं दिख रहा है. पत्रकारों के मुताबिक 'मैनपुरी में भोगांव और मैनपुरी सदर सीट पर फिलहाल भाजपा का कब्जा है. वर्तमान जातीय समीकरणों के लिहाज से देखें तो लोध, शाक्य और सवर्ण जातियों के गठबंधन के कारण अभी भी भाजपा का पलड़ा भारी दिखाई देता है. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर सपा ने जो उलटफेर या वापसी की है उसने बीजेपी की चिंता बढ़ा दी है. अगर 2027 में सपा का पीडीए फॉर्मूला पूरी तरह सफल रहा तो बीजेपी को बड़ा झटका लग सकता है और मुकाबला बेहद कांटे का होगा.'
2027 के महामुकाबले में किसकी दौड़ेगी साइकिल?
भोगांव विधानसभा सीट पर सियासी सस्पेंस गहराया हुआ है. बीजेपी जहां अपने इस जीते हुए गढ़ को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है. वहीं सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की प्रतिष्ठा इस बात पर टिकी है कि वह अपने घर (मैनपुरी) की इस हारी हुई सीट पर दोबारा साइकिल कैसे दौड़ाएं. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या 2027 में लोध और शाक्य मतदाता बीजेपी के साथ बने रहेंगे? और इस सीट पर ठीक-ठाक संख्या में मौजूद दलित वोटबैंक पर मायावती की क्या भूमिका होगी?
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