Mood kya hai Aligarh: अलीगढ़ में बीजेपी की ये गलती पड़ सकती है भारी! पत्रकारों ने बता दी असली चुनौती

अकरम खान

• 01:38 PM • 09 Aug 2026

Mood kya hai Aligarh: 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के गढ़ में एंटी-इंकंबेंसी, विधायकों से नाराजगी और अधिकारियों के रवैये पर सवाल हैं. सपा का PDA दांव और टिकट बदलाव की रणनीति अलीगढ़ के सियासी समीकरण बदल सकती है.

Mood kya hai Aligarh

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Mood kya hai Aligarh: साल 2017 और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में अलीगढ़ जिले की सातों विधानसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने क्लीन स्विप करते हुए प्रचंड जीत हासिल की थी. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष के मजबूत प्रदर्शन और बदलते सियासी घटनाक्रमों के बाद अब 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर जिला बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है. यूपी Tak के खास शो 'मूड क्या है' में अलीगढ़ के वरिष्ठ और दिग्गज पत्रकारों ने जिले के राजनीतिक समीकरणों, 10 साल की एंटी-इंकंबेंसी, जनप्रतिनिधियों से नाराजगी और नौकरशाही (अधिकारियों) के रवैये पर खुलकर अपनी राय रखी. पत्रकारों का मानना है कि अगर बीजेपी ने अपने मौजूदा विधायकों के चेहरे नहीं बदले तो उसे इस बार बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है.

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क्या हैं जनता और पत्रकारों के मुख्य मुद्दे?

वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि 2017 और 2022 में जिले की सातों सीटों पर लगभग एक ही चेहरे रिपीट हुए थे. 9-10 सालों से लगातार सत्ता में रहने के कारण विधायकों के प्रति जनता में एक स्वाभाविक नाराजगी है. आरोप है कि स्थानीय जनप्रतिनिधि जनसमस्याओं को सुलझाने की जगह व्यक्तिगत कामों में लगे रहे. यदि पार्टी 2027 में भी इन्हीं चेहरों पर दांव लगाती है, तो इसका सीधा फायदा विपक्ष को मिल सकता है.

अधिकारियों का रवैया और 'जनसुनवाई' का सच

वरिष्ठ पत्रकारों ने अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल की कमी और अफसरों की 'राजाशाही कार्यशैली' को बड़ा मुद्दा बताया. आईजीआरएस पोर्टल (IGRS Portal) पर मिलने वाली शिकायतों का महज कागजी और फर्जी निस्तारण किए जाने का दावा किया गया. किसानों को खाद की किल्लत, टैगिंग की समस्या और बिजली आपूर्ति की दिक्कतों से रोजाना कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन करने को मजबूर होना पड़ रहा है.

राष्ट्रीय-प्रादेशिक मुद्दे और आंदोलनों का असर

पत्रकारों के अनुसार हाल ही में देश स्तर पर हुए नीट (NEET) छात्र आंदोलनों और रोजगार-बेरोजगारी के मुद्दों ने युवाओं के मन में काफी असर डाला है. इसके अलावा, राम मंदिर निर्माण से जुड़े चंदा-चोरी प्रकरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी जनता के बीच अलग-अलग स्तर पर चर्चाएं हैं, जो चुनाव के समय भावनात्मक रूप से मतदाताओं के माइंडसेट को प्रभावित कर सकती हैं.

विधानसभा सीटों का गणित: क्या कह रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार?

सातों सीटों का सुरतेहाल: प्रेस क्लब से जुड़े पत्रकारों का मानना है कि आज की तारीख में यदि चुनाव होते हैं तो बीजेपी के लिए राह आसान नहीं है. कुछ पत्रकारों ने यहां तक कहा कि अगर वर्तमान विधायकों को रिपीट किया गया और चुनाव निष्पक्ष लड़ा गया, तो बीजेपी को 6 सीटों पर कड़ी टक्कर या नुकसान का सामना करना पड़ सकता है. जबकि केवल एक सीट (छर्रा या खैर/अन्य) ही व्यक्तिगत प्रभाव के बल पर बच पाएगी.

विकास कार्य बनाम जमीनी गुस्सा: हालांकि पत्रकारों का एक तबका यह भी मानता है कि बीजेपी सरकार ने अलीगढ़ को राजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय, डिफेंस कॉरिडोर, ट्रांसपोर्ट नगर और अटल आवासीय विद्यालय जैसी कई बड़ी सौगातें दी हैं. विकास धरातल पर दिखा है लेकिन विधायकों का स्थानीय विरोध इस विकास पर भारी पड़ रहा है.

टिकट बदलने की रणनीति: बीजेपी नेतृत्व द्वारा कराए जा रहे अंदरूनी सर्वे में भी टिकट काटने की चर्चाएं हैं. यदि बीजेपी 50 से 70 फीसदी मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर नए और बेदाग चेहरों को उतारती है तो वह 5 से 6 सीटों पर दोबारा मजबूत बढ़त हासिल कर सकती है.

विपक्ष की सुस्ती और 'पीडीए' कार्ड: समाजवादी पार्टी (SP) के लिए अतरौली और अलीगढ़ सदर जैसी सीटों पर 'पीडीए' (PDA - पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला काफी असरदार साबित हो सकता है. बशर्ते सपा सही उम्मीदवार चुने और एसी कमरों से बाहर निकलकर जमीनी स्तर पर जनता की लड़ाई लड़े.

2027 के चुनाव से पहले अलीगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती एंटी-इंकंबेंसी और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के खिलाफ पनप रहा असंतोष है. यदि बीजेपी सही समय पर डैमेज कंट्रोल करते हुए प्रत्याशी बदलती है तो वह अपने इस अभेद्य किले को बचा सकती है. वहीं अगर समाजवादी पार्टी और विपक्ष इस जमीनी असंतोष को वोटों में बदलने में कामयाब होता है तो अलीगढ़ के नतीजे 2027 में प्रदेश की सियासत को हैरान कर सकते हैं.