इमरान मसूद सपा पर लगातार हैं आक्रामक पर फिर भी क्यों शांत हैं अखिलेश? समझिए पूरा विश्लेषण

कुमार अभिषेक

• 11:27 AM • 15 Jul 2026

Aaj ka UP: यूपी में कांग्रेस और सपा के बीच बढ़ती बयानबाजी ने इंडिया गठबंधन पर सवाल खड़े कर दिए हैं. इमरान मसूद के हमलों, सीट शेयरिंग विवाद और मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति के बीच जानिए 2027 चुनाव से पहले क्या बन रहे हैं नए समीकरण.

Imran Masood and Akhilesh Yadav

Imran Masood and Akhilesh Yadav

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यूपी Tak के खास शो आज का यूपी में हम राज्य की तीन बड़ी खबरों का विश्लेषण करते हैं. आज की पहली बड़ी खबर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के अखिलेश यादव के खिलाफ दिए गए तीखे बयानों को लेकर है जिसने गठबंधन के भीतर खलबली मचा दी है. दूसरी बड़ी खबर आगामी विधानसभा चुनाव के लिए दोनों पार्टियों के बीच सीट शेयरिंग (सीटों के बंटवारे) को लेकर मचे घमासान और दोनों दलों की अलग-अलग रणनीतियों के इर्द-गिर्द घूमती है. वहीं आज की तीसरी बड़ी खबर उत्तर प्रदेश में मुस्लिम और दलित वोट बैंक पर एकाधिकार जमाने की मची होड़ और अखिलेश यादव के सॉफ्ट हिंदुत्व कार्ड के बाद कांग्रेस द्वारा खुद को अल्पसंख्यकों की असली आवाज साबित करने की भविष्य की रणनीति पर आधारित है.

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कांग्रेस न होती तो 2022 जैसा होता सपा का हश्र

पिछले दो दिनों से इमरान मसूद लगातार समाजवादी पार्टी को सीधे निशाने पर ले रहे हैं. मसूद का साफ कहना है कि अगर 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी का साथ नहीं मिला होता तो समाजवादी पार्टी का हश्र भी साल 2022 के विधानसभा चुनाव जैसा ही होता. यानी सपा आज जहां खड़ी है, कांग्रेस के बिना वह आधे रास्ते पर ही अटक जाती.

इतना ही नहीं इमरान मसूद अब अखिलेश यादव की घेराबंदी करने के लिए मुस्लिम कार्ड भी खेल रहे हैं. उनका आरोप है कि समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव मुसलमानों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं. मसूद के इन हमलों से साफ है कि वह यूपी की सियासत में मुस्लिम मतदाताओं के सामने कांग्रेस को एकमात्र विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.

सीट शेयरिंग की टाइमिंग पर फंसा पेंच

ऊपरी तौर पर यह लड़ाई भले ही बयानों की दिख रही हो लेकिन अंदरूनी कहानी पूरी तरह से सीट शेयरिंग के गणित से जुड़ी हुई है. आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब लगभग 7-8 महीने का ही वक्त बचा है. कांग्रेस पार्टी चाहती है कि सीट बंटवारे का मामला आखिरी वक्त (जनवरी) तक न खींचे ताकि उन्हें तैयारी का पूरा मौका मिले. कांग्रेस का दबाव है कि प्रदेश के हर जिले में उन्हें कम से कम एक सीट दी जाए और जहां वे मजबूत हैं, वहां सीटों की संख्या ज्यादा हो. कांग्रेस ने बाकायदा ए ग्रेड की 170 सीटों की लिस्ट भी तैयार कर ली है.

इसके विपरीत समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव फिलहाल सीट शेयरिंग की चर्चा को टालना चाहते हैं. अखिलेश का तर्क है कि कांग्रेस पहले अपने मजबूत कैंडिडेट्स के नाम बताए उसके बाद सीटों की संख्या तय होगी. कांग्रेस को डर है कि अगर मामला जनवरी तक खिंचा तो उन्हें सपा की दया पर निर्भर रहना पड़ेगा और मनमुताबिक सीटें नहीं मिलेंगी.

अखिलेश का साइलेंट मोड

इमरान मसूद और यूपी के नए प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम (जिन्होंने आते ही कहा था कि बात बराबरी के स्तर पर होगी) के हमलों के बावजूद, अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी के नेताओं को शांत रहने की हिदायत दी है. अखिलेश ने सभी प्रवक्ताओं और सांसदों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के खिलाफ कोई बयानबाजी न करें.

दरअसल, अखिलेश यादव इस नाजुक मोड़ पर बचे-खुचे वर्किंग रिश्तों को पूरी तरह खत्म नहीं करना चाहते. चूंकि वे फिलहाल देश से बाहर हैं इसलिए एक प्रिकॉशनरी मेजर (एहतियाती कदम) के तौर पर उन्होंने अपने बेलगाम होते नेताओं को रोक लिया है ताकि उनकी अनुपस्थिति में पूरा गठबंधन ही न बिखर जाए. फिलहाल सपा के लोग अंदर ही अंदर खून का घूंट पीकर रह रहे हैं.

मुस्लिम वोट बैंक और विचारधारा का असली द्वंद्व

इस पूरे विवाद की जड़ में उत्तर प्रदेश का मुस्लिम वोट बैंक है. कांग्रेस को लगता है कि अखिलेश यादव इन दिनों सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर हैं. चाहे शंकराचार्य की शरण में जाना हो, राम मंदिर के मुद्दे को उठाना हो या ज्योतिष की बातें करना. राहुल गांधी ने इस बीच राम मंदिर के मुद्दों पर दूरी बनाए रखी है. ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि यूपी के मुसलमानों की असली और बेबाक आवाज अब कांग्रेस है. जबकि मुसलमान मजबूरी में सपा के साथ जुड़े हुए हैं. अगर कांग्रेस मजबूती से खड़ी रही तो मुस्लिम वोट बैंक उनकी तरफ शिफ्ट हो सकता है. यही बात अखिलेश यादव को खटक रही है.

इसके अलावा इंडिया अलायंस की पिछली बैठक में अखिलेश यादव ने कांग्रेस को आईना दिखाते हुए याद दिलाया था कि यदि पिछले चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में सही उम्मीदवारों को टिकट दिया होता तो गठबंधन की 12-15 सीटें और बढ़ सकती थीं और केंद्र में बीजेपी की सरकार बनना मुश्किल हो जाता.

सपा और कांग्रेस के बीच खिंची ये तलवारें सिर्फ तात्कालिक गुस्सा नहीं बल्कि भविष्य की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं. देश भर में रीजनल पार्टियों के सिकुड़ते जनाधार के बीच कांग्रेस खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में देख रही है. अब देखना यह होगा कि सीट शेयरिंग के इस हाई-वोल्टेज प्रेशर गेम में क्या अखिलेश यादव झुकेंगे या फिर आगामी विधानसभा चुनाव से पहले यूपी में इंडिया गठबंधन का यह ताना-बाना पूरी तरह बिखर जाएगा.