उत्तर प्रदेश के औरैया जिले की सबसे चर्चित और हॉट सीटों में शुमार दिबियापुर विधानसभा का चुनावी इतिहास भले ही ज्यादा पुराना न हो लेकिन यहां की सियासत हमेशा से सुर्खियों में रही है. साल 2012 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई इस सीट पर हर चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली है. 2022 के विधानसभा चुनाव में तो महज 473 वोटों के बेहद बारीक अंतर से फैसला हुआ था, जहां सपा के प्रदीप यादव ने बाजी मारी थी. अब सवाल यह है कि क्या 2027 के चुनाव में सपा अपनी बढ़त बरकरार रख पाएगी या फिर बीजेपी अपनी विकास योजनाओं और सुशासन के दम पर इस सीट पर वापसी करेगी? आइए जानते हैं दिबियापुर के राजनीतिक इतिहास, जातीय समीकरण और स्थानीय राजनीति के मिजाज को.
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दिबियापुर का राजनीतिक इतिहास
2012 परिसीमन के बाद पहला चुनाव: औरैया और अजीतमल के हिस्सों को काटकर बनाई गई इस नई विधानसभा में 2012 में पहला चुनाव हुआ. इसमें सपा के प्रदीप यादव ने जीत दर्ज की और प्रदेश में सपा की सरकार बनी.
2017 में बीजेपी का पलटवार: 2017 की लहर में बीजेपी ने जोरदार वापसी की और पार्टी प्रत्याशी लाखन सिंह राजपूत ने प्रदीप यादव को हराकर विधायक की कुर्सी संभाली.
2022 का बेहद रोमांचक मुकाबला: 2022 का चुनाव बेहद दिलचस्प रहा. सपा के प्रदीप यादव ने बीजेपी के लाखन सिंह राजपूत को महज 473 वोटों के अंतर से हराकर सीट वापस छीन ली. यानी 500 से भी कम वोटों ने हार-जीत की पटकथा लिखी.
2027 के लिए दोनों दलों के अपने-अपने दावे
सपा का दावा (स्थानीय मुद्दे व सरकार का विरोध): समाजवादी पार्टी को मौजूदा विधायक प्रदीप यादव की जनता के बीच सक्रियता, महंगाई, किसानों की बदहाली और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर भरोसा है. सपा नेताओं का कहना है कि जनता बदलाव के मूड में है और यदि निष्पक्ष चुनाव हुआ तो बीजेपी का सूपड़ा साफ होगा.
बीजेपी का दावा
बीजेपी का तर्क है कि 2022 में बसपा के कमजोर पड़ने और संविधान खत्म होने के फैलाए गए भ्रम की वजह से वोट शिफ्ट हुए थे, जो भ्रम अब दूर हो चुका है. बीजेपी का कहना है कि योगी सरकार में मेडिकल कॉलेज, कॉटेज बस स्टैंड और अछल्दा में कृषि विज्ञान केंद्र के लिए 1000 एकड़ जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने जैसे बड़े विकास कार्यों व कानून व्यवस्था के दम पर पार्टी 2027 में दोबारा जीत दर्ज करेगी.
दिबियापुर का जातीय गणित
दिबियापुर विधानसभा में चुनाव के नतीजे तय करने में जातीय गोलबंदी सबसे अहम मानी जाती है. क्षेत्र में राजपूत और यादव मतदाताओं की आबादी सबसे ज्यादा और प्रभावशाली है.
लोध/राजपूत वोटर्स: लगभग 55,000
यादव वोटर्स: लगभग 45,000 से 50,000
ब्राह्मण वोटर्स: लगभग 20,000
क्षत्रिय वोटर्स: लगभग 15,000
मुस्लिम वोटर्स: लगभग 8,000
इसके अलावा दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के मतदाता भी चुनावी नतीजों को पलटने में अहम भूमिका निभाते हैं.
क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार और जानकार?
स्थानीय वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों का मानना है कि दिबियापुर में सिर्फ जातीय समीकरण ही नहीं बल्कि प्रत्याशी का व्यक्तिगत चेहरा और स्थानीय विकास कार्य भी काफी मायने रखते हैं. सत्ता पक्ष जहां सुशासन और डबल इंजन सरकार की उपलब्धियों की दुहाई दे रहा है. वहीं विपक्ष स्थानीय बेरोजगारी, सड़कों की बदहाली और किसान समस्याओं को मुद्दा बना रहा है.
फिलहाल 2027 की सियासी जंग को लेकर माहौल बनना शुरू हो चुका है. लेकिन राजनीतिक जानकारों का कहना है कि असली तस्वीर दोनों प्रमुख दलों द्वारा उम्मीदवारों के आधिकारिक ऐलान के बाद ही साफ हो पाएगी.
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