Mood kya hai Mathura: मथुरा की सियासत 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले गर्माने लगी है. 2022 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने मथुरा जिले की सभी पांचों सीटों (मथुरा-वृंदावन, छाता, गोवर्धन, मांट और बलदेव) पर परचम लहराया था जिसमें मांट सीट पर भाजपा ने इतिहास में पहली बार जीत दर्ज की थी. हालांकि 2027 का रण जैसे-जैसे करीब आ रहा है विकास के अधूरे वादों, स्थानीय समस्याओं और उभरते जन-आक्रोश के चलते भाजपा के लिए यह राह इतनी आसान नजर नहीं आ रही है. यमुना की दुर्दशा, शहर में जलभराव, बेरोजगारी और हालिया युवाओं के विरोध प्रदर्शनों ने विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के भीतर भी हलचल बढ़ा दी है. क्या 2027 में भाजपा अपनी सभी पांचों सीटें बचा पाएगी या सपा-कांग्रेस और बसपा का नया कॉम्बिनेशन खेल बिगाड़ेगा? मथुरा के चार दशकों के वरिष्ठ पत्रकारों की राय और पांचों सीटों का पूरा सियासी गणित जानिए इस रिपोर्ट में.
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मथुरा की जमीनी हकीकत
मथुरा के वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि इस बार जनता के बीच नाराजगी का माहौल है जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है.
जलभराव और बदहाल इंफ्रास्ट्रक्चर: मथुरा शहर में हल्की बारिश होते ही जलभराव की स्थिति बन जाती है और शहर कई हिस्सों में बंट जाता है. स्थानीय निवासियों में इसको लेकर भारी रोष है.
यमुना स्वच्छता का अधूरा वादा: साल 2016 में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने 2018 तक यमुना में आचमन योग्य पानी का वादा किया था. हालांकि स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि आज भी शहर के तीन बड़े नाले सीधे यमुना में गिर रहे हैं और स्थिति जस की तस बनी हुई है.
यातायात और ट्रेनों का ठहराव: तीर्थनगरी होने के बावजूद मथुरा में जाम की समस्या और नई ट्रेनों (जैसे वंदे भारत या गतिमान) के ठहराव न होने से स्थानीय व्यापारी व आम जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है.
युवाओं और जैनजी (Gen Z) का आक्रोश: युवाओं और नए मतदाताओं के बीच बेरोजगारी और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर नाराजगी देखी जा रही है जो भाजपा के जीत के अंतर (मार्जिन) को कम कर सकती है.
पांचों विधानसभा सीटों का सियासी गणित और अंदरूनी रार
मथुरा-वृंदावन: पारंपरिक रूप से भाजपा का मजबूत गढ़ रही इस सीट पर राम मंदिर आंदोलन के समय से ही भाजपा की एकतरफा पकड़ रही है. लेकिन इस बार भाजपा के भीतर सांगठनिक असंतोष और नाराज कार्यकर्ताओं की वजह से चुनौती बढ़ सकती है. यदि कांग्रेस और सपा मिलकर कोई मजबूत व सर्वसम्मत प्रत्याशी उतारते हैं तो मुकाबला कांटे का हो सकता है.
छाता: कैबिनेट मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी का क्षेत्र होने के बावजूद यहां अंदरूनी गुटबाजी खुलकर सामने आ रही है. भाजपा के ही पूर्व सांसद और स्थानीय नेताओं के बीच बयानबाजी जारी है. इसके अलावा छाता में चीनी मिल का पुराना मुद्दा भी चुनाव पर असर डाल सकता है.
मांट: आठ बार के विधायक पंडित श्याम सुंदर शर्मा को 2022 में हराकर भाजपा ने पहली बार यह सीट जीती थी. हालांकि जाट बाहुल्य इस सीट पर आरएलडी (रालोद) के साथ गठबंधन के बावजूद कांटे की टक्कर रहने की उम्मीद है.
गोवर्धन: पूर्व विधायक राजकुमार रावत के बसपा में शामिल होने के बाद गोवर्धन सीट पर भाजपा बनाम बसपा का सीधा और कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है.
बलदेव: आरएलडी और भाजपा का गठबंधन होने से कागजों पर स्थिति मजबूत दिखती है.लेकिन बसपा का इस क्षेत्र में पारंपरिक प्रभाव होने के कारण मुकाबला बेहद दिलचस्प होगा.
रालोद-भाजपा गठबंधन और टिकटों का पेंच
जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के भाजपा के साथ आने से समीकरण बदले हैं. मथुरा जिले में रालोद हर सीट पर अपनी मजबूत दावेदारी जता रही है. चर्चा है कि रालोद को गोकुल (बलदेव) या मांट जैसी सीटों में से प्रत्याशी उतारने का मौका मिल सकता है.
हालांकि यदि सीटों के बंटवारे में सहमति नहीं बनी या स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं में तालमेल की कमी रही तो एंटी-इंकम्बेन्सी का फायदा विपक्ष (बसपा या सपा-कांग्रेस गठबंधन) की तरफ झुक सकता है.
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