Mood kya hai Mainpuri: सपा के गढ़ मैनपुरी में 50-50 की जंग में उलझीं 4 सीटें, अखिलेश मारेंगे बाजी या बीजेपी बिगाड़ेगी समीकरण?

पुष्पेंद्र सिंह

• 05:34 PM • 30 Jul 2026

यूपी Tak के 'मूड क्या है' विश्लेषण में जानिए 2027 विधानसभा चुनाव में मैनपुरी की चारों सीटों का सियासी गणित. क्या सपा का पीडीए फॉर्मूला चलेगा या बीजेपी प्रत्याशी चयन और विकास के दम पर बाजी मारेगी?

Mood kya hai Mainpuri

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Mood kya hai Mainpuri:उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से बिसात बिछने लगी है. समाजवादी पार्टी का गढ़ माने जाने वाले मैनपुरी जिले की राजनीति में इस बार कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है. 2022 के विधानसभा चुनाव में जहां जिले की 4 सीटों में से 2 पर बीजेपी (मैनपुरी सदर और भोगांव) और 2 पर सपा (करहल और किसनी) का कब्जा रहा था. वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा सांसद डिंपल यादव ने चारों ही विधानसभा क्षेत्रों में भारी बढ़त बनाई थी. अब सवाल यह है कि 2027 में मैनपुरी का ऊंट किस करवट बैठेगा? क्या अखिलेश यादव का पीडीए कार्ड फिर कमाल दिखाएगा या बीजेपी नया दांव खेलकर बाजी मारेगी?

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मैनपुरी सदर सीट: जयवीर सिंह फिर लड़ेंगे या बदलेगा प्रत्याशी?

मैनपुरी सदर सीट से योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री जयवीर सिंह विधायक हैं.

विकास कार्य और छवि: स्थानीय स्तर पर पर्यटन, धार्मिक जीर्णोद्धार और विकास कार्यों के दम पर जयवीर सिंह की स्थिति मजबूत मानी जा रही है. उन्होंने क्षेत्र में अपना आवास निर्माण भी शुरू कराया है जिससे उनके यहां से दोबारा चुनाव लड़ने की चर्चाओं को बल मिला है.

विकल्प और दावेदार: यदि बीजेपी कोई नया प्रयोग करती है या सीट बदलती है तो पूर्व विधायक अशोक सिंह चौहान, पूर्व जिलाध्यक्ष प्रदीप सिंह चौहान, ममता राजपूत या कोई यादव प्रत्याशी लाइन में हैं.

भोगांव सीट: लोधी बनाम शाक्य का उलझा गणित

भोगांव सीट पर बीजेपी के रामनरेश अग्निहोत्री लगातार दो बार से विधायक हैं. लेकिन यहां का जातीय समीकरण बेहद विचित्र है.

लोधी बनाम शाक्य: स्थानीय राजनीतिक गणित के अनुसार अगर कोई दल लोधी प्रत्याशी उतारता है तो शाक्य मतदाता दूसरे पाले (सपा या बीजेपी) में खिसक जाता है.

सपा की घेराबंदी: सपा इस बार लोधी दांव खेलने पर विचार कर रही है. वहीं बीजेपी भी ब्रज क्षेत्र में लोधी वोट बैंक को लामबंद करने में जुटी है. यादव, मुस्लिम, लोधी और शाक्य मतदाताओं का तालमेल ही यहां जीत-हार तय करेगा.

करहल सीट: सपा का पैतृक गढ़, पर बीजेपी दे रही कड़ी टक्कर

अखिलेश यादव के इस्तीफा देने के बाद उपचुनाव में तेज प्रताप यादव भले ही यहां से जीते हों लेकिन बीजेपी ने उनके ही रिश्तेदार अनुज ईश यादव को उतारकर जीत का अंतर काफी कम कर दिया था. स्थानीय विश्लेषकों का मानना है कि यदि बीजेपी ने 2027 में फिर से कोई मजबूत चेहरा उतारा तो करहल में मुकाबला बेहद कड़ा हो सकता है.

किसनी (सुरक्षित) सीट: सपा का अजेय किला

किसनी सीट लंबे समय से समाजवादी पार्टी का गढ़ रही है और वर्तमान में यहां से तीन बार के विधायक ब्रजेश कठेरिया का दबदबा है. हालांकि तीन बार के विधायक के खिलाफ कुछ जन विरोध भी है जिसे भुनाने के लिए बीजेपी नए रणनीति की तलाश में है. सपा भी यहां चेहरे में बदलाव करने पर विचार कर सकती है.

क्या होगा 2027 का नतीजा?

स्थानीय वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि वर्तमान में स्थिति 50-50 की है. लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे और डिंपल यादव का चेहरा हावी था. लेकिन विधानसभा चुनाव स्थानीय विधायकों के काम और छवि पर लड़ा जाता है. यदि अखिलेश यादव का पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूला फिर से चला तो सपा चारों सीटों पर परचम लहरा सकती है. वहीं यदि बीजेपी ने प्रत्याशियों का चयन सही रखा तो नतीजे चौंकाने वाले भी हो सकते हैं.

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