बसपा से बड़े ब्राह्मण नेता मयंक द्विवेदी को तोड़ लाए अखिलेश यादव! इस सीट पर खेलेंगे दांव

कुमार अभिषेक

19 Sep 2026 (अपडेटेड: 19 Sep 2026, 04:26 PM)

बांदा-चित्रकूट में बसपा को बड़ा झटका लगा है. 2024 लोकसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी रहे मयंक द्विवेदी समर्थकों संग सपा में शामिल हुए. अखिलेश यादव से मुलाकात के बाद उनकी एंट्री हुई. जानिए मयंक द्विवेदी की राजनीतिक पृष्ठभूमि और सियासी मायने.

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उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है. अंदरूनी कलह और नेताओं के पार्टी छोड़ने से जूझ रही बहुजन समाज पार्टी को बुंदेलखंड के बांदा-चित्रकूट इलाके में बड़ा झटका लगा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में बांदा सीट से बसपा के प्रत्याशी रहे और करीब 2.45 लाख वोट हासिल करने वाले मयंक द्विवेदी अपने बड़ी संख्या में समर्थकों के साथ समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं. 19 सितंबर को उन्होंने सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात की जिसके बाद उनके सपा का दामन थामने पर मुहर लग गई. मयंक द्विवेदी के पिता और पूर्व विधायक स्व. पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी के सियासी रसूख के चलते इस जॉइनिंग को बुंदेलखंड में सपा के लिए एक बड़े ब्राह्मण चेहरे की एंट्री के तौर पर देखा जा रहा है.

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कौन हैं मयंक द्विवेदी? 

मयंक द्विवेदी बांदा-चित्रकूट क्षेत्र के एक प्रमुख और प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं. उनके पिता पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी बसपा के कद्दावर नेता रहे हैं और 2007 में नरैनी (तत्कालीन नैनी/नरैनी) विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं. हालिया 2024 के बांदा-चित्रकूट लोकसभा चुनाव में भले ही सपा की कृष्णा देवी शिवशंकर पटेल ने जीत दर्ज की हो लेकिन मयंक द्विवेदी तीसरे नंबर पर रहते हुए भी 2,45,000 से अधिक वोट हासिल करने में सफल रहे थे.

बांदा-चित्रकूट में सपा को मिला मजबूत 'ब्राह्मण चेहरा'

बुंदेलखंड का बांदा-चित्रकूट इलाका लंबे समय से समाजवादी पार्टी के लिए कमजोर कड़ी रहा है. इस क्षेत्र में सपा को एक प्रभावशाली और सर्वमान्य ब्राह्मण चेहरे की सख्त दरकार थी. मयंक द्विवेदी के आने से सपा का यह 'टिक बॉक्स' पूरा होता नजर आ रहा है. वहीं दूसरी तरफ आकाश आनंद के मामले के बाद बसपा में दिख रही निराशा के बीच मयंक का जाना बसपा के लिए इस इलाके में बड़ा नुकसान माना जा रहा है.

नरैनी और बांदा सदर सीटों का बदला सियासी गणित

मयंक द्विवेदी की एंट्री को सीधे तौर पर नरैनी (सुरक्षित) और बांदा सदर विधानसभा सीटों के समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है. नरैनी सुरक्षित सीट पर पिछले 5 चुनावों से सपा एक बार भी जीत दर्ज नहीं कर सकी है. 2022 और 2017 में यहां भाजपा (ओममणि वर्मा और राजकरण कबीर) ने जीत दर्ज की. इससे पहले 2012 (गयाचरण दिनकर), 2007 (पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी) और 2002 (सुरेंद्र पाल वर्मा) में यह सीट बसपा के पास रही.

जातीय समीकरण और सपा की रणनीति

ब्राह्मण: 45,000

दलित: 45,000

यादव: 32,000

वैश्य: 28,000

कुशवाहा: 28,000

मुस्लिम: 25,000

सुरक्षित सीट होने के कारण सपा यहां किसी दलित चेहरे को उतारेगी और मयंक द्विवेदी के जरिए ब्राह्मण + यादव + मुस्लिम (BYM) गठजोड़ बनाकर जीत का सूखा खत्म करने की कोशिश करेगी. इसके अलावा बांदा सदर सीट पर जहां भाजपा के प्रकाश द्विवेदी विधायक हैं. वहां भी मयंक द्विवेदी को सपा एक मजबूत ब्राह्मण विकल्प के रूप में इस्तेमाल कर सकती है.

सपा में लगातार जारी है जॉइनिंग का सिलसिला

2027 के चुनाव से पहले सपा में अन्य दलों के नेताओं का आने का सिलसिला तेज हो गया है. मयंक द्विवेदी से पहले हाल ही में पूर्व मंत्री हेमराज वर्मा और राम आश्रय कुशवाहा ने भी भाजपा छोड़कर सपा में वापसी की है. बुंदेलखंड के इस राजनीतिक घटनाक्रम से साफ है कि सपा अब अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ-साथ गैर-यादव ओबीसी और ब्राह्मण वोटरों को जोड़कर भाजपा के किले को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है.
 

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