देवरिया में भाजपा विधायकों की क्या है जमीनी हकीकत, पत्रकारों ने समझा दिया पूरा समीकरण

राम प्रताप सिंह

• 07:38 PM • 18 Sep 2026

देवरिया में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज है. जिले की सातों सीटों पर बीजेपी का कब्जा है. लेकिन एंटी-इंकंबेंसी, टिकट बदलाव, पीडीए समीकरण और युवा-महिला वोटरों के रुझान से चुनावी मुकाबला दिलचस्प होने की चर्चा है.

Mood Kya Hai Deoria

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Mood Kya Hai Deoria: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो गई है. इसी कड़ी में पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख सियासी गढ़ देवरिया जिले की सातों विधानसभा सीटों पर चुनावी हलचल तेज हो गई है. वर्तमान में देवरिया की सातों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है. लेकिन आगामी चुनाव को लेकर जिले के वरिष्ठ पत्रकारों और सियासी विश्लेषकों का मानना है कि इस बार बीजेपी एंटी-इंकंबेंसी से निपटने के लिए 'गुजरात मॉडल' अपनाते हुए अपने आधे से ज्यादा विधायकों के टिकट काट सकती है. समाजवादी पार्टी के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) कार्ड, स्थानीय नाराजगी और युवाओं व महिला वोटरों के रुझान के बीच देवरिया की सातों सीटों का चुनावी गणित बेहद दिलचस्प नजर आ रहा है.

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देवरिया सदर और पथरदेवा: बीजेपी के मजबूत किले

जिले के वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, देवरिया की दो प्रमुख सीटें फिलहाल बीजेपी के लिए सबसे मजबूत मानी जा रही हैं.

देवरिया सदर: यहां से वर्तमान विधायक और बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता शलभ मणि त्रिपाठी की स्थिति काफी मजबूत मानी जा रही है. जनता के बीच उनकी सक्रियता और 'हीरोइक इमेज' के चलते उनका टिकट लगभग तय माना जा रहा है.

पथरदेवा: यह कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही का पारंपरिक गढ़ है. चुनावी राजनीति के लंबे अनुभव के चलते वे अंतिम समय में गेम बदलने में माहिर माने जाते हैं. हालांकि उम्र के पैमाने को देखते हुए नई रणनीति या चेहरा बदलने की चर्चाएं भी सियासी गलियारों में हैं.

भाटपार रानी, रामपुर कारखाना और सलेमपुर: कांटे की टक्कर और 'पीडीए' का असर

इन सीटों पर विपक्ष (सपा) और बीजेपी के बीच बेहद कड़ा मुकाबला होने का अनुमान है. 

भाटपार रानी: पिछले चुनाव में सपा के पूर्व विधायक आशुतोष उपाध्याय बेहद कम अंतर से हारे थे. इस बार वे 'पीडीए' समीकरण को साधने में पूरी ताकत लगा रहे हैं. यदि पिछड़ा और निषाद समाज का वोट बैंक एकजुट होता है तो यहां बीजेपी को भारी चुनौती मिल सकती है.

रामपुर कारखाना: यहां जीत-हार का अंतर अक्सर 10 से 15 हजार वोटों का रहता है. युवाओं के मुद्दे और जातीय समीकरण यहां बड़ा उलटफेर कर सकते हैं.

सलेमपुर: राज्य मंत्री विजय लक्ष्मी गौतम की इस सीट पर कम मार्जिन और स्थानीय स्तर पर नाराजगी की बातें सामने आ रही हैं. पत्रकारों के मुताबिक, यहां बीजेपी नया चेहरा उतार सकती है वरना सपा से सीधी टक्कर होगी.

बरहज और रुद्रपुर: टिकट बदलाव और जातीय लामबंदी

बरहज: यहां से बीजेपी के दीपक मिश्रा 'शाका' करीब 16,000 वोटों से जीते थे. लेकिन इस बार परिस्थितियां बदल रही हैं। बीजेपी यहां नया प्रत्याशी उतार सकती है, वहीं सपा भी मजबूत उम्मीदवार की तलाश में है.

रुद्रपुर: जय प्रकाश निषाद का अपनी बिरादरी और कैडर वोट बैंक में दबदबा कायम है जिससे यह सीट बीजेपी के लिए सुरक्षित मानी जा रही है.

टिकट बदलने की रणनीति और निर्णायक वोटर

वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार बीजेपी अक्सर नाराजगी दूर करने के लिए सीटिंग विधायकों के टिकट काटती रही है. 2022 में देवरिया में 5 टिकट बदले गए थे और बीजेपी ने सातों सीटें जीती थीं. 2027 में भी यही प्रयोग दोहराया जा सकता है.

महिलाएं और युवा वोटर होंगे गेमचेंजर: सरकार की मुफ्त राशन और कल्याणकारी योजनाओं के चलते महिला वोटर बीजेपी का मजबूत आधार बनी हुई हैं. दूसरी तरफ, जेनरेशन-जी (Gen-Z) और युवा वोटर रोजगार व नीट (NEET) जैसे मुद्दों को लेकर अपनी नई राय बना रहे हैं.

एक देश-एक चुनाव का सस्पेंस: यदि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' लागू होता है, तो 2027 की सरकार का कार्यकाल छोटा हो सकता है जिसका असर प्रत्याशियों के चुनावी बजट और रणनीति पर पड़ेगा.

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