अखिलेश-जयंत की लड़ाई में किसके साथ हैं गुर्जर? जानिए पश्चिम यूपी का नया सियासी समीकरण

यूपी तक

• 03:44 PM • 18 Sep 2026

Mudde Ki Baat: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी यूपी में सपा और आरएलडी के बीच सियासी खींचतान बढ़ रही है. अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की जुबानी जंग के बीच गुर्जर समाज को लेकर सपा की सक्रियता चर्चा में है. जानिए पश्चिमी यूपी के जातीय समीकरणों में गुर्जर वोट की भूमिका क्यों अहम मानी जा रही है.

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Mudde Ki Baat: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच पश्चिमी यूपी की सियासत तेजी से गरमा रही है. समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष जयंत चौधरी के बीच बढ़ती जुबानी जंग ने इस इलाके की राजनीति को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है.

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दोनों नेता कभी साथ चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन अब उनके राजनीतिक रास्ते अलग हैं. ऐसे में बड़ा सवाल है कि अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की इस लड़ाई में गुर्जर समाज किस तरफ खड़ा होगा?

दरअसल, पश्चिमी यूपी में जाट वोट पर जयंत चौधरी और आरएलडी की पकड़ को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है. 2022 में सपा और आरएलडी ने साथ चुनाव लड़ा था. उस चुनाव में आरएलडी ने 33 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 8 सीटें जीतीं. 2017 में पार्टी के पास सिर्फ एक विधानसभा सीट थी.

इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले आरएलडी एनडीए में शामिल हो गई. फरवरी 2024 में केंद्र ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने का ऐलान किया और मार्च में राष्ट्रपति ने सम्मान मरणोपरांत प्रदान किया. सम्मान ग्रहण करने वालों में उनके पोते जयंत चौधरी भी शामिल थे.

यहीं से पश्चिमी यूपी का पुराना सियासी समीकरण बदलता दिखा. 2024 में सपा ने उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में 37 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी को 33 और आरएलडी को 2 सीटें मिलीं.

जाटों के बाद गुर्जरों पर फोकस क्यों?

'यूपी Tak' के कार्यक्रम मुद्दे की बात में वरिष्ठ पत्रकार शादाब रिजवी ने इसी बदलते समीकरण पर बात करते हुए बताया कि जाट वोट के लिहाज से जयंत चौधरी और आरएलडी की मौजूदगी सपा के लिए पश्चिमी यूपी में चुनौती है. ऐसे में सपा गुर्जर समाज के बीच अपना आधार बढ़ाने पर काम कर रही है.

गुर्जर बहुल इलाकों में सपा की गतिविधियां बढ़ने की बात सामने आई है. पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी के जरिए गुर्जर चौपालों और सभाओं पर भी फोकस किया जा रहा है. 

पश्चिमी यूपी में गुर्जर समाज की मौजूदगी कई विधानसभा सीटों के समीकरण को प्रभावित कर सकती है. यही वजह है कि अखिलेश यादव की रणनीति में इस समाज को लेकर सक्रियता को जयंत चौधरी और आरएलडी के प्रभाव के बीच एक अलग राजनीतिक पहल के तौर पर देखा जा रहा है.

लेकिन क्या गुर्जर पूरी तरह अखिलेश के साथ हैं?

यहां तस्वीर को सीधी लकीर में देखना ठीक नहीं होगा. गुर्जर समाज को एकमुश्त किसी एक पार्टी के साथ जोड़ना जल्दबाजी होगी. अलग-अलग इलाकों और सीटों पर स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, पार्टी संगठन और स्थानीय मुद्दे वोटिंग को प्रभावित कर सकते हैं.

यही कारण है कि अखिलेश यादव के लिए गुर्जर समाज के बीच पहुंच बढ़ाना एक कोशिश है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरा गुर्जर वोट बैंक सपा के साथ चला गया है. दूसरी तरफ जयंत चौधरी की राजनीति भी सिर्फ जाट वोट तक सीमित नहीं है और पश्चिमी यूपी में आरएलडी का अपना संगठन और सामाजिक आधार है.

अखिलेश-जयंत की जुबानी जंग से क्या बदला?

दोनों नेताओं के बीच हालिया बयानबाजी ने इस पूरे समीकरण को और चर्चा में ला दिया है. अखिलेश यादव के 'चवन्नी' वाले तंज के बाद जयंत चौधरी ने भी पलटवार किया. जयंत ने इसे लेकर अखिलेश की राजनीति और उनके रवैये पर सवाल उठाए.

इस विवाद का असर सिर्फ दोनों नेताओं के रिश्ते तक सीमित नहीं है. पश्चिमी यूपी में जाट, गुर्जर, मुस्लिम, दलित और किसान वोटों के बीच बनने वाले समीकरणों पर भी इसकी नजर है. यही वजह है कि 2027 से पहले अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच बढ़ती दूरी को सामाजिक आधार के विस्तार की कोशिशों के साथ जोड़कर देखा जा रहा है.

अखिलेश-जयंत की लड़ाई में असली दांव क्या है?

दरअसल, पश्चिमी यूपी में लड़ाई सिर्फ अखिलेश यादव बनाम जयंत चौधरी नहीं है. यह अलग-अलग सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश भी है. एक तरफ जयंत चौधरी के साथ आरएलडी का पुराना जाट आधार है, तो दूसरी तरफ सपा अपने मुस्लिम आधार के साथ दूसरे सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है.

इसी रणनीति में गुर्जर समाज की भूमिका अहम हो जाती है. सपा की गुर्जर चौपालें और सभाएं इस बात का संकेत हैं कि पार्टी पश्चिमी यूपी में अपने सामाजिक आधार को और फैलाना चाहती है. इसके साथ ही बसपा, आजाद समाज पार्टी और एआईएमआईएम जैसे दल भी पश्चिमी यूपी के समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं. 

फिलहाल गुर्जर समाज किस तरफ पूरी तरह जाएगा, इसकी तस्वीर चुनाव के करीब आने पर ही साफ होगी, लेकिन इतना जरूर है कि अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की सियासी लड़ाई में गुर्जर वोट अब चर्चा बन चुका है.