Mood kya hai Gorakhpur: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर की सभी 9 विधानसभा सीटों पर 2022 में भारतीय जनता पार्टी ने परचम लहराया था. लेकिन 2027 के महासंग्राम से पहले क्या गोरखपुर में बीजेपी अपनी इस बढ़त को बरकरार रख पाएगी या विपक्षी दल जातीय समीकरणों के सहारे कोई बड़ा उलटफेर करेंगे? यूपी Tak की खास शो 'मूड क्या है' में गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने खुलकर अपनी बात रखी. विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि गोरखपुर में वोट केवल 'योगी मॉडल' और विकास के नाम पर पड़ता है जबकि मौजूदा कई विधायकों की कार्यप्रणाली से जनता में भारी नाराजगी है.
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प्रत्याशी मायने नहीं रखते योगी के नाम पर मिलता है वोट
वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, गोरखपुर में भारतीय जनता पार्टी की ताकत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का चेहरा और उनका विकास मॉडल है.
टीपी शाही (वरिष्ठ पत्रकार): "योगी जी ने विकास के मामले में गोरखपुर को 50 साल आगे पहुंचा दिया है. इंसेफेलाइटिस का खात्मा, रामगढ़ ताल का सौंदर्यकरण, फर्टिलाइजर कारखाना और पिपराइच चीनी मिल का चालू होना उनकी बड़ी उपलब्धियां हैं. लेकिन नौ में से कम से कम पांच विधायक ऐसे हैं जो अगर अपने दम पर चुनाव मैदान में उतर जाएं तो उनकी जमानत तक जब्त हो जाएगी. अगर बीजेपी ने 2027 में कई विधायकों के टिकट नहीं बदले तो मुश्किलें बढ़ सकती हैं."
2022 में अंतर कम क्यों रहा?
चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार काजी मोहम्मद ने 2022 के आंकड़ों और चुनावी जीत के अंतर पर प्रकाश डाला. चिल्लूपार और शहर विधानसभा जैसी सीटों पर हार-जीत का अंतर अपेक्षा से कम रहने के पीछे मुख्य वजह जातीय गोलबंदी रही.
काजी मोहम्मद (वरिष्ठ पत्रकार): "जातीय समीकरण आज भी जमीनी सच्चाई हैं. अगर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) पूरी ताकत से चुनाव लड़ती है, तो इसका फायदा बीजेपी को मिलता है. लेकिन अगर बसपा थोड़ी इनएक्टिव हुई, तो बीजेपी की राह कठिन हो सकती है. हालांकि योगी जी का कोई सीधा विकल्प फिलहाल प्रदेश या पूर्वांचल में नजर नहीं आता."
अपराध पर लगाम और सम्मान का मुद्दा
अरविंद राय (वरिष्ठ पत्रकार): "एक वक्त था जब गोरखपुर की पहचान अपराध, अराजकता, इंसेफेलाइटिस और भ्रष्टाचार से होती थी. आज अपराध पर पूरी तरह अंकुश लगा है. व्यापारी, मजदूर या रिक्शा चालक-हर वर्ग को सम्मान मिला है. रिक्शा चालक भी आज गर्व से पैसा मांगता है क्योंकि उसे पुलिस या बाहुबलियों का खौफ नहीं है. यही वजह है कि जनता योगी आदित्यनाथ के साथ खड़ी दिखती है." उन्होंने कहा कि अगर विपक्ष का गठबंधन भी होता है तो मुकाबला कांटे का होगा, लेकिन विकास और सुशासन के दम पर बीजेपी मजबूत स्थिति में है.
'ठेकेदार से विधायक बने लोगों से नाराजगी'
वरिष्ठ पत्रकारों ने विधायकों की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए. टीपी शाही ने कहा कि कई ऐसे प्रत्याशी विधायक बन गए हैं जो कभी ठेकेदारी करते थे और अफसरों के सामने आवाज उठाने में असमर्थ हैं. जनता चाहती है कि 2027 में साफ-सुथरी छवि वाले और जमीन से जुड़े पार्टी कार्यकर्ताओं को टिकट दिया जाए.
गोरखपुर की जनता का अनूठा मिजाज
बातचीत के दौरान पत्रकारों ने गोरखपुर के राजनीतिक इतिहास के रोचक पहलुओं को भी याद दिलाया. इसी गोरखपुर की जनता ने पूर्व मुख्यमंत्री टीएन सिंह को चुनाव हरा दिया था. 2018 के उपचुनाव में बीजेपी प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा था. देश में पहली बार किसी किन्नर को मेयर चुनने का इतिहास भी गोरखपुर की जनता ने ही रचा था.
वरिष्ठ पत्रकार नीरज श्रीवास्तव और शैलेंद्र जी का कहना है कि गोरखपुर में प्रत्याशी कोई भी हो, चुनाव खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर लड़ा जाता है. युवाओं के बीच रोजगार, पेपर लीक और यूजीसी के मुद्दे जरूर चर्चा में हैं. लेकिन जिस तरह फोरलेन-सिक्स लेन सड़कों का संजाल बिछा है और रामगढ़ ताल से लेकर चिलुआताल का कायाकल्प हुआ है उससे विकास का पलड़ा ही भारी नजर आता है.
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