Mood Kya Hai Lalitpur: सपा जहां कभी नहीं जीत पाई उस ललितपुर का क्या है राजनीतिक समीकरण, पत्रकारों ने ये बताया

मनीष सोनी

• 05:46 PM • 23 Sep 2026

ललितपुर में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज है. बीजेपी के सामने बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य सेवाएं, पानी और किसानों से जुड़े मुद्दे हैं. वहीं जातीय समीकरण, कानून व्यवस्था और मोदी-योगी फैक्टर के बीच विपक्ष के सामने मजबूत चुनौती खड़ी है.

Mood Kya Hai Lalitpur

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Mood Kya Hai Lalitpur: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी दूर हों लेकिन बुंदेलखंड के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले ललितपुर जिले में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं. जिले की दोनों विधानसभा सीटें ललितपुर सदर और मेहरौनी (सुरक्षित) पर पिछले दो चुनावों (2017 और 2022) से भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है.

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लेकिन क्या 2027 में भी बीजेपी का यह किला अभेद्य रहेगा या फिर धरातल पर फैली बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, टूटती सड़कें और बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं उसके लिए चुनौती बनेंगी? प्रेस क्लब ललितपुर में हुई वरिष्ठ पत्रकारों की चर्चा के अनुसार, इलाके में भले ही स्थानीय समस्याओं और जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी हो. लेकिन चुनाव की मेज पर अंततः जातीय समीकरण, कानून व्यवस्था और 'मोदी-योगी का चेहरा' ही हावी रहता है.

बीजेपी का मजबूत किला और सोशल इंजीनियरिंग का गणित

ललितपुर सदर से बीजेपी विधायक राम रतन कुशवाहा और मेहरौनी सीट से श्रम राज्य मंत्री मनोहर लाल पंथ (मुन्नू कोरी) का कब्जा है. जिले का राजनीतिक इतिहास देखें तो यहां बीएसपी द्वारा शुरू की गई 'सोशल इंजीनियरिंग' का सीधा फायदा बीजेपी को मिला है.

जातिगत वोट बैंक: सदर सीट पर कुशवाहा समाज का दबदबा है. कुशवाहा, लोधी, साहू और सवर्ण समाज (लगभग 80%+) बीजेपी का परंपरागत और मुख्य वोट बैंक बना हुआ है.

बसपा का बिखराव: बहुजन समाज पार्टी के कमजोर होने के बाद उसका कैडर और व्यक्तिगत वोट बैंक भी बड़े पैमाने पर बीजेपी की तरफ शिफ्ट हुआ है.

कमजोर विपक्ष: उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) का ललितपुर में अब तक कोई खाता नहीं खुल पाया है. विपक्षी गठबंधन (PDA) के पास फिलहाल यहां कोई सर्वमान्य या मजबूत स्थानीय चेहरा नजर नहीं आ रहा है.

धरातल पर योजनाओं का हाल

स्थानीय स्तर पर सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर जनता और पत्रकारों में भारी असंतोष देखने को मिल रहा है.

नमामि गंगे और नल-जल योजना: पत्रकारों का कहना है कि 5 साल में घर-घर पानी पहुंचने के बजाय सिर्फ सड़कें खोदकर छोड़ दी गईं. लोग आज भी टैंकरों के भरोसे हैं. कई इलाकों में पाइपलाइन तक नहीं पहुंची है और फाइलों में काम पूरा दिखा दिया गया है.

प्रधानमंत्री आवास योजना में रिश्वतखोरी: स्थानीय लोगों का आरोप है कि पीएम आवास के नाम पर ₹3000 तक की रिश्वत खुलेआम ली जा रही है.

हावी ब्यूरोक्रेसी: जीरो टॉलरेंस के दावों के बावजूद स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार चरम पर है. बीएसए (BSA) दफ्तर में हाल ही में रिश्वत लेते पकड़े जाने के बावजूद कड़ी कार्रवाई न होने से प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं.

मेडिकल कॉलेज बना 'रेफर सेंटर', बेरोजगारी और पलायन बड़ी समस्या

जिले में बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लेकर कुछ मुख्य मुद्दे सामने आए हैं.

स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल: जिले में मेडिकल कॉलेज तो बन गया है. लेकिन कार्डियोलॉजिस्ट (हृदय रोग विशेषज्ञ) और न्यूरोलॉजिस्ट न होने के कारण मरीजों को आज भी भोपाल और ग्वालियर रेफर करना पड़ता है.

स्थानीय रोजगार का अभाव: बजाज पावर प्लांट और फार्मा पार्क की घोषणाओं के बावजूद स्थानीय युवाओं को नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं. रोजगार की तलाश में युवाओं का पलायन जारी है.

किसानों का दर्द: नहरों के अंतिम छोर तक पानी न पहुंचना, भारी बारिश से उड़द और मूंग की फसलों का तबाह होना और समय पर मुआवजा न मिलना किसानों की मुख्य चिंता है.

स्थानीय मुद्दों पर क्यों भारी पड़ता है 'जातीय समीकरण'?

जिले में पिछले दोनों चुनावों में पूरे प्रदेश में सबसे अधिक वोटिंग प्रतिशत दर्ज किया गया था. जागरूक मतदाता विकास और मुद्दों की बात तो करते हैं. लेकिन मतदान के दिन सारे स्थानीय मुद्दे शून्य हो जाते हैं.

ब्रांड मोदी-योगी और लॉ एंड ऑर्डर: स्थानीय विधायकों के कामकाज से भले ही लोग बहुत संतुष्ट न हों. लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की 'अपराध मुक्त व भयमुक्त' यूपी की छवि और केंद्र सरकार की बड़ी योजनाओं के नाम पर लोग वोट देते हैं.

विपक्ष का चेहरा न होना: जब तक विपक्षी दल (सपा या अन्य) किसी मजबूत स्थानीय चेहरे को मैदान में उतारकर इन स्थानीय मुद्दों को आक्रामक तरीके से नहीं उठाते, तब तक बीजेपी की मजबूत स्थिति को हिलाना बेहद मुश्किल नजर आ रहा है.

ललितपुर में 2027 की लड़ाई कागजों और धरातल के बीच फंसी है. एक तरफ योजनाओं का सुस्त क्रियान्वयन और प्रशासनिक भ्रष्टाचार है तो दूसरी तरफ मजबूत जातीय गठजोड़ और योगी सरकार का लॉ एंड ऑर्डर मॉडल. जब तक विपक्ष जमीनी मुद्दों को जनांदोलन में नहीं बदलता तब तक ललितपुर में बीजेपी का पलड़ा भारी दिख रहा है.

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