योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश के बीते नौ साल महज कैलेंडर की तारीखें नहीं, बल्कि एक राज्य के पुनर्जन्म की गौरवगाथा हैं. 2017 से पहले जिस प्रदेश की पहचान 'वन डिस्ट्रिक्ट, वन माफिया' के तंज से होती थी, आज वही यूपी अपनी मजबूत कानून-व्यवस्था के दम पर दुनियाभर के निवेशकों के लिए 'सपनों का गंतव्य' बन चुका है. यह बदलाव रातों-रात नहीं आया, बल्कि इसके पीछे अपराध और अपराधियों के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की वह अडिग नीति है, जिसने माफिया राज के समानांतर साम्राज्य को ध्वस्त कर कानून के राज की नींव रखी. आज यूपी ने अविश्वास से आत्मविश्वास और समस्या से समाधान की एक ऐसी ऐतिहासिक यात्रा तय की है, जिसकी गूंज सात समंदर पार तक सुनाई दे रही है.
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2017 से पहले के उत्तर प्रदेश की धुंधली तस्वीर को याद करें, तो वहां राजनीति का एजेंडा विकास नहीं, बल्कि जातिगत विभाजन, क्षेत्रीय वैमनस्यता और तुष्टिकरण था. सत्ता के संरक्षण में पल रहे गुंडे-मवाली आम आदमी की छाती पर मूंग दलते थे और संगठित अपराध के जरिए 'गुंडा टैक्स' की वसूली एक कड़वी हकीकत थी. न व्यापारी की तिजोरी सुरक्षित थी और न ही घर से बाहर निकली बेटियों की इज्जत. अराजकता का आलम यह था कि शाम छह बजे के बाद बाजार खौफ के सन्नाटे में डूब जाते थे. लेकिन पिछले नौ वर्षों में सरकार ने इस 'उपद्रव आधारित' छवि को खंडित कर प्रदेश को 'उत्सव आधारित' समाज में तब्दील कर दिया है. आज दंगाइयों का खौफ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पर्यटन और 'टेम्पल-ड्रिवन इकोनॉमी' का वैभव प्रदेश की नई पहचान है.
बेहतर कानून व्यवस्था की तस्दीक करते हैं आंकड़े
कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर आए इस क्रांतिकारी बदलाव की तस्दीक आंकड़े भी करते हैं. 2016 की तुलना में आज प्रदेश में डकैती के मामलों में 89 प्रतिशत और लूट में 85 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है. हत्या जैसे जघन्य अपराधों में भी 47 प्रतिशत की कमी आई है, जो राज्य में भयमुक्त वातावरण का स्पष्ट प्रमाण है. सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि बीते नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने एक भी बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं झेला. यह वही प्रदेश है जहां कभी बात-बात पर कर्फ्यू लग जाया करता था, लेकिन आज वही ऊर्जा 'मिशन शक्ति' और 'सेफ सिटी' जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए महिलाओं और बच्चों को सुरक्षा कवच प्रदान करने में लग रही है.
योगी सरकार की नई पुलिस और नई पुलिसिंग व्यवस्था
पुलिसिंग के आधुनिकीकरण ने इस सुरक्षा चक्र को और भी अभेद्य बना दिया है. कभी खपरैल की छतों वाले बदहाल थानों में काम करने वाली पुलिस आज सात पुलिस कमिश्नरेट और हाई-राइज बिल्डिंग्स वाले आधुनिक केंद्रों से संचालित हो रही है. यूपी-112 की सेवा ने रिस्पॉन्स टाइम को एक घंटा पांच मिनट से घटाकर महज छह मिनट पर लाकर खड़ा कर दिया है, जो किसी चमत्कार से कम नहीं है. पुलिस बल में 2.19 लाख से अधिक पारदर्शी भर्तियां की गईं, जिनमें 44 हजार से अधिक बेटियों की मौजूदगी ने विभाग के मानवीय चेहरे को मजबूती दी है. साथ ही, लखनऊ में स्थापित फॉरेंसिक साइंस इंस्टीट्यूट (UPSIFS) और हर मंडल में बन रही ए-ग्रेड एफएसएल लैब ने अपराधियों के लिए सजा की दर को बढ़ाने का वैज्ञानिक आधार तैयार कर दिया है.
भयभीत अपराधी और भविष्य के लिए आश्वस्त आम नागरिक
आज का उत्तर प्रदेश निवेश के लिए ऐसी सुरक्षित जगह में तब्दील हो चुका है, जहां भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के लिए कोई जगह नहीं है. दंगाइयों और अपराधियों के विरुद्ध गठित विशेष सुरक्षा बल (UPSSF) और पुनर्जीवित पीएसी कंपनियों ने सुरक्षा का वह माहौल बनाया है, जिससे वैश्विक कंपनियां अब यूपी की जमीन पर अपनी किस्मत आजमा रही हैं. संक्षेप में कहें तो यह नौ साल माफिया के अंत और आम नागरिक के सशक्तीकरण के साल रहे हैं. उत्तर प्रदेश अब वह 'उत्सव प्रदेश' है, जहां अपराधी भयभीत हैं और आम नागरिक अपने भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त.
लेखक: भावेष पांडेय, अधिवक्ता, इलाहाबाद हाईकोर्ट लखनऊ खंडपीठ
Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.
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