Raebareli Sona Chandi Bhav 7th July 2026: मलमास समाप्त होते ही जिले में एक बार फिर शहनाइयों की गूंज सुनाई देने लगी है. शादी-विवाह का सीजन शुरू होते ही बाजारों में रौनक तो लौट आई है, लेकिन इस बार महंगाई का रंग कुछ ज्यादा ही चोखा नजर आ रहा है. 15 जुलाई तक मांगलिक कार्यक्रमों की भारी भरमार है, जिसके चलते बर्तन और सराफा बाजारों में खरीदारों की आवाजाही बढ़ गई है.
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हालांकि, सोना-चांदी, स्टील और अन्य धातुओं के दामों में आई रिकॉर्ड तेजी ने आम आदमी के बजट का गणित पूरी तरह बिगाड़ दिया है. हालात यह हैं कि लोग जरूरत और सामर्थ्य के अनुसार कम मात्रा में ही सामान खरीदकर रस्मों की औपचारिकता निभाने को मजबूर हैं.
सुबह से शाम तक भीड़, लेकिन बिक्री में नहीं वह पहले जैसी बात
क्षेत्र के प्रमुख बाजारों में इन दिनों सुबह से लेकर देर शाम तक खरीदारों की चहल-पहल बनी हुई है. शादियों से जुड़े साजो-सामान और कपड़ों की दुकानों पर पैर रखने की जगह नहीं है, लेकिन दुकानदारों के चेहरे पर वह पुरानी खुशी गायब है. इसका मुख्य कारण महंगाई है.पहले जहां लोग शादियों में दिल खोलकर बर्तनों के सेट और भारी जेवर खरीदते थे, वहीं अब केवल बेहद जरूरी सामान लेकर ही काम चलाया जा रहा है. दिखावे की जगह अब सिर्फ परंपराओं को पूरा करने पर जोर दिया जा रहा है.
कच्चे माल की कीमतों में उछाल से बढ़े दाम
बर्तन और सराफा कारोबारियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे माल की कीमतों में लगातार हो रही वृद्धि के कारण तैयार माल काफी महंगा हो गया है. इसके चलते ग्राहक पहले की तुलना में आधी खरीदारी ही कर रहे हैं. व्यापारियों के अनुसार, वे भी ग्राहकों की जेब और जरूरत को समझते हुए उनके बजट के अनुकूल हल्के और कम दाम वाले विकल्प उपलब्ध करा रहे हैं, ताकि शादियों की रस्में बिना किसी बाधा के पूरी हो सकें.
दिखावे से तौबा, जरूरत पर फोकस
व्यापारियों के मुताबिक, सहालग (शादियों का सीजन) शुरू होने से बाजार में फुटफॉल (ग्राहकों की संख्या) तो बढ़ा है, लेकिन कुल बिक्री का ग्राफ पिछले वर्षों के मुकाबले काफी नीचे है. मध्यम और नौकरीपेशा परिवारों की प्राथमिकता अब भव्यता के बजाय केवल आवश्यक खरीदारी तक सिमट कर रह गई है. आसमान छूती महंगाई के बीच लोग अपनी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए दूसरे खर्चों में कटौती कर बजट को संतुलित करने का संघर्ष कर रहे हैं.
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