उत्तर प्रदेश के शिक्षा केंद्र प्रयागराज में TGT और PGT भर्ती की नई नियमावली को लेकर अभ्यर्थियों का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा है. नई नियमावली में बीएड (B.Ed) की अनिवार्यता, न्यूनतम अंक सीमा और परीक्षा पैटर्न में किए गए अचानक बदलावों के खिलाफ अभ्यर्थी बीते 5 सितंबर से शिक्षा निदेशालय के सामने अनवरत धरना और आमरण अनशन कर रहे हैं. इस लंबे खींचते आंदोलन और मानसिक तनाव के बीच जौनपुर के एक सक्रिय प्रतियोगी छात्र की मौत के बाद माहौल और ज्यादा गरमा गया है.
ADVERTISEMENT
जौनपुर के छात्र विजय बहादुर की ब्रेन हेमरेज से मौत, आंदोलनकारियों में हड़कंप
आंदोलन की अगुवाई कर रहे छात्र नेता आशुतोष पांडेय ने बताया कि भर्ती नियमों में अचानक हुए बदलाव और अनिश्चितता के कारण अभ्यर्थी भारी मानसिक तनाव झेल रहे हैं. इसी तनाव के बीच आंदोलन में लगातार सक्रिय रहे जौनपुर निवासी अभ्यर्थी विजय बहादुर की ब्रेन हेमरेज के कारण दर्दनाक मौत हो गई. इस घटना के बाद से अनशन पर बैठे छात्रों का आक्रोश और बढ़ गया है. छात्र नेताओं ने मृतक के परिजनों को तुरंत उचित आर्थिक मुआवजा देने और पुरानी नियमावली के आधार पर अभ्यर्थियों को कम से कम एक या दो अंतिम अवसर देने की पुरजोर मांग की है.
B.Ed की अनिवार्यता और परीक्षा पैटर्न में बदलाव का विरोध
प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों का कहना है कि सरकार द्वारा अचानक नए नियम लागू कर दिए जाने से वर्षों से तैयारी कर रहे छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है. अभ्यर्थियों की मुख्य मांगें निम्न हैं:
पुराना पैटर्न लागू हो: नई भर्ती को पुरानी नियमावली के तहत ही संपन्न कराया जाए या पुराने पैटर्न पर अभ्यर्थियों को 1-2 अवसर दिए जाएं.
पारदर्शिता और परीक्षा तिथि: भर्ती प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता लाई जाए और परीक्षा की तिथियों की जल्द से जल्द घोषणा हो.
पदों की संख्या में इजाफा: TGT-PGT के रिक्त पदों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि अधिक से अधिक युवाओं को मौका मिल सके.
5 सितंबर से जारी है जंग, प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
अपनी मांगों को लेकर अभ्यर्थी 5 सितंबर से लगातार शारीरिक और मानसिक कष्ट सहते हुए डटे हुए हैं. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि कड़ाके की धूप और अनशन के बावजूद शासन-प्रशासन की ओर से अभी तक उनसे वार्ता का कोई ठोस सकारात्मक आश्वासन नहीं मिला है. अभ्यर्थियों का स्पष्ट कहना है कि यह आंदोलन महज एक विरोध नहीं, बल्कि उनके भविष्य की सुरक्षा की आखिरी लड़ाई है. वे मांग कर रहे हैं कि सरकार उनकी समस्याओं को गंभीरता से ले और जल्द कोई राहत भरा फैसला सुनाए.
ADVERTISEMENT










