इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद को पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत दर्ज यौन शोषण के मामले में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) दे दी है. कोर्ट ने इस मामले में कई गंभीर विरोधाभासों और संदेहों का उल्लेख किया है.आपको बता दें कि दो लड़कों ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य पर यौन शोषण का आरोप लगाया था. एक घटना जून 2024 (मध्य प्रदेश आश्रम) और दूसरी 18-19 जनवरी 2026 (प्रयागराज माघ मेला) की बताई गई थी. एफआईआर पीड़ितों के माता-पिता ने नहीं, बल्कि आशुतोष महाराज नामक एक तीसरे व्यक्ति ने दर्ज कराई थी.
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कोर्ट में आशुतोष महाराज और अभियोजन पक्ष क्यों विफल रहे?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने जमानत देते समय कई कारणों को आधार बनाया. पीड़ितों ने दावा किया था कि वे आश्रम के छात्र थे, लेकिन जांच में पाया गया कि वे कभी भी 'श्री विद्या मठ' के छात्र नहीं रहे, बल्कि वे हरदोई के एक स्कूल के छात्र थे. घटना जनवरी की बताई गई, लेकिन एफआईआर के लिए पहली अर्जी 6 दिन बाद दी गई. आशुतोष महाराज ने तर्क दिया कि वे 'यज्ञ' कर रहे थे, जिसे कोर्ट ने अपर्याप्त माना. पीड़ितों ने अपने माता-पिता के बजाय एक अजनबी व्यक्ति (आशुतोष महाराज) को अपनी आपबीती सुनाई, जो कोर्ट की नजर में असामान्य था. मेडिकल रिपोर्ट में किसी भी प्रकार की शारीरिक चोट या यौन हमले की पक्की पुष्टि नहीं हुई. जिस दिन (18 जनवरी 2026) प्रशासन और स्वामी के बीच विवाद चल रहा था, उसी दिन और समय पर घटना का होना संदेह पैदा करता है.
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