माघ मेला में 3 करोड़ की पोर्शे से घूमने वाले ये सतुआ बाबा कौन है, जानिए इनकी असल कहानी

Who is Satua Baba: संतोष तिवारी से सतुआ बाबा बनने की कहानी काफी पुरानी है. दरअसल विष्णु स्वामी संप्रदाय की पीठ के मुखिया को सतुआ बाबा कहा जाता है. इस परंपरा की शुरुआत 18वीं शताब्दी में महंत रणछोड़ दास जी ने काशी के मणिकर्णिका घाट पर की थी. संतोष दास इस संप्रदाय के 97वें आचार्य हैं.

who is satua baba

सुषमा पांडेय

16 Jan 2026 (अपडेटेड: 16 Jan 2026, 01:29 PM)

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Who is Satua Baba: संगम की रेती पर चल रहे माघ मेले में इस बार सिर्फ साधना और तपस्या ही नहीं बल्कि काला चश्मा और करोड़ों की गाड़िों में घूमने वाले एक बाबा भी चर्चा में बने हैं जिनका नाम है सतुआ बाबा. सोशल मीडिया पर इन दिनों सतुआ बाबा उर्फ संतोष दास की तस्वीरें और वीडियो जबरदस्त बवाल मचा रहे हैं. कभी 3 करोड़ की पोर्शे कार का पूजन तो कभी प्राइवेट जेट में सफर बाबा का ठाठ-बाट देखकर हर कोई हैरान है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या एक संन्यासी का जीवन ऐसा होना चाहिए? लेकिन बाबा का जवाब और भी कड़क है. उन्होंने साफ कह दिया है कि 'सनातन की रफ्तार रोकने वालों को इन गाड़ियों की रफ्तार से कुचल दिया जाएगा.'

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3 करोड़ की पोर्शे में घूमते दिखे सतुआ बाबा

हाल ही में सतुआ बाबा ने लैंड रोवर डिफेंडर के बाद करीब 3 करोड़ रुपये की पोर्शे कार अपने काफिले में शामिल की है. जब यह कार माघ मेले के शिविर में पहुंची तो विधिविधान से इसकी पूजा की गई. आलोचकों को जवाब देते हुए बाबा ने कहा 'जिन्हें बाबाओं की गाड़ियों से जलन है वे सनातन के नहीं पाकिस्तान के हैं.' उन्होंने हुंकार भरते हुए कहा कि सनातन अब शास्त्र और शस्त्र के साथ रफ्तार वाला भी है.

सतुआ बाबा की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के करीबियों में गिना जाता है. हाल ही में जब सीएम योगी ने संगम में डुबकी लगाई तब सतुआ बाबा उनके साथ थे. इतना ही नहीं दिसंबर 2025 में प्रयागराज के डीएम मनीष कुमार वर्मा का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वे बाबा के आश्रम में चूल्हे पर रोटियां सेकते नजर आए थे. इस घटना ने राजनीतिक गलियारों में खूब चर्चा बटोरी थी.

कैसे पड़ा सतुआ बाबा नाम?

संतोष तिवारी से सतुआ बाबा बनने की कहानी काफी पुरानी है. दरअसल विष्णु स्वामी संप्रदाय की पीठ के मुखिया को सतुआ बाबा कहा जाता है. इस परंपरा की शुरुआत 18वीं शताब्दी में महंत रणछोड़ दास जी ने काशी के मणिकर्णिका घाट पर की थी. संतोष दास इस संप्रदाय के 97वें आचार्य हैं.

11 साल की उम्र में छोड़ा घर, अब जगद्गुरु की उपाधि

ललितपुर में जन्मे संतोष तिवारी ने महज 11 साल की उम्र में सन्यास ले लिया था. साल 2012 में छठे पीठाधीश्वर यमुनाचार्य जी महाराज के निधन के बाद उन्होंने गद्दी संभाली. उनकी लोकप्रियता का ग्राफ इतनी तेजी से बढ़ा कि महाकुंभ 2025 में उन्हें जगद्गुरु की उपाधि से नवाजा गया.आज काशी से लेकर प्रयागराज तक प्रशासन से लेकर सत्ता तक बाबा की बात सुनी जाती है. माघ मेला 2026 में सतुआ बाबा को सबसे बड़ा और लग्जरी सुविधाओं वाला पंडाल मिला है. बाबा का मानना है कि सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार भव्यता के साथ होना चाहिए. वे अक्सर पीएम मोदी और सीएम योगी के विजन का समर्थन करते हैं और मुरारी बापू की राम कथाओं में भी सक्रिय नजर आते हैं.

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