Who is Shankaracharya Swami Avimukteshwaranand: प्रयागराज के संगम तट पर मौनी अमावस्या के पावन पर्व पर एक तरफ जहां करोड़ों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगा रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और पुलिस प्रशासन के बीच जमकर संग्राम छिड़ गया. रस्मों, परंपराओं और वीआईपी ट्रीटमेंट को लेकर हुआ यह विवाद अब सियासी गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक छाया हुआ है. इन सबके बीच शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार फिर से सुर्खियों में हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि ये कौन हैं और आखिर मौनी अमावस्या पर शुरू हुआ ये पूरा विवाद क्या था.
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आमने सामने आए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और पुलिस प्रशासन
मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अपने करीब 200 समर्थकों के साथ रथ और पालकी पर सवार होकर संगम स्नान के लिए निकले थे. विवाद तब शुरू हुआ जब पुलिस ने भीड़ का हवाला देते हुए उन्हें बैरियर पर रोक दिया. पुलिस कमिश्नर के अनुसार मौनी अमावस्या पर वीआईपी मूवमेंट प्रतिबंधित था. इसके बावजूद शंकराचार्य ने बैरियर तोड़ा और भारी भीड़ के बीच रथ ले जाने की जिद की जिससे करीब 3 घंटे तक अव्यवस्था बनी रही.वहीं स्वामी जी का कहना है कि प्रशासन ने जानबूझकर उनके समर्थकों पर हमला किया और उन्हें गिरफ्तार किया.उन्होंने इसे पुरानी राजनीतिक खुन्नस का नतीजा बताया.उन्होंने आगे कहा कि 'हम सही गलत नहीं तय करेंगे. यह तो समय तय करेगा कि सही क्या है, गलत क्या है.'
उमाशंकर पांडे से शंकराचार्य तक का सफर
आज जो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने कड़े तेवरों के लिए जाने जाते हैं उनकी शुरुआत उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के एक छोटे से गांव ब्राह्मणपुर से हुई थी. उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ और माता-पिता ने नाम रखा उमाशंकर पांडे रखा था. कक्षा 6 तक गांव में पढ़ने के बाद वे पिता के साथ गुजरात गए.वहां काशी के संत रामचैतन्य से मिले और सन्यास मार्ग पर चल पड़े. काशी में उनकी मुलाकात स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुई. उन्होंने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शिक्षा ली और स्वरूपानंद जी के सबसे प्रिय शिष्यों में शामिल हो गए. 2022 में गुरु स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के बाद उन्हें ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य बनाया गया.
विवादों से पुराना नाता
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का नाम अक्सर आंदोलनों और सत्ता से टकराव के कारण सुर्खियों में रहता है. साल 2008 में गंगा संरक्षण के लिए उन्होंने काशी में 112 दिनों तक अनशन कियाजिससे वे पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए. साल 2015 में गणेश प्रतिमा विसर्जन को लेकर हुए विवाद में संतों पर लाठीचार्ज हुआ जिसमें वे घायल हुए थे. बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उनसे माफी मांगी थी. साल 2018 में कॉरिडोर निर्माण के दौरान प्राचीन मंदिरों के विस्थापन के खिलाफ उन्होंने मोर्चा खोला था. 2022 में ज्ञानवापी में मिले 'शिवलिंग' की पूजा का ऐलान कर उन्होंने प्रशासन की नींद उड़ा दी थी.
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