यह कहानी केवल एक बीमारी या कानूनी लड़ाई की नहीं है बल्कि यह कहानी है दो भाइयों के उस अटूट प्रेम की जिसे देखकर लोग आशीष राणा को कलयुग का लक्ष्मण कह रहे हैं. साल 2013 में जब हरीश राणा एक हादसे के बाद कोमा में चले गए तब आशीष महज 12वीं कक्षा में पढ़ रहे थे. उस उम्र में जहां बच्चे अपने भविष्य के सपने बुनते हैं आशीष ने अपना जीवन अपने बड़े भाई की सेवा में झोंक दिया.12 सालों तक हर सुबह 4 बजे उठकर भाई के डायपर बदलने से लेकर उनकी फीडिंग और सफाई तक आशीष ने वो सब किया जो शायद ही कोई कर पाए. आज जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हरीश को शांतिपूर्ण विदाई दी जा रही है तो आशीष का वह संघर्ष हर किसी की आंखों को नम कर रहा है.
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पढ़ाई के साथ निभाई भाई की जिम्मेदारी
पड़ोसियों और परिवार के करीबियों के अनुसार, आशीष ने कभी अपने भाई का साथ नहीं छोड़ा. वे सुबह जल्दी उठकर पहले हरीश की देखभाल से जुड़े रोजमर्रा के तमाम काम जैसे स्पंजिंग, फीडिंग ट्यूब की सफाई और बेडशीट बदलना पूरा करते थे. इसके बाद वे अपनी पढ़ाई के लिए जाते और शाम को लौटकर फिर से भाई की देखरेख में जुट जाते. इसी कठिन परिस्थिति के बीच आशीष ने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया और आज वे गुरुग्राम की एक कंपनी में नौकरी कर परिवार का सहारा बने हुए हैं.
घर-बार बिका पर भाई के लिए उम्मीद नहीं छोड़ी
हरीश के पिता अशोक राणा ने अपने बेटे को बचाने के लिए चंडीगढ़ पीजीआई से लेकर दिल्ली एम्स तक के चक्कर लगाए. इस लंबी लड़ाई में परिवार की सारी जमापूंजी खत्म हो गई.इलाज के खर्च के लिए उन्होंने अपना घर तक बेच दिया और ढाई फीट की तंग गली वाले मकान में रहने को मजबूर हुए. पिता ने बताया कि दवाओं और सक्शन कैथेटर जैसे उपकरणों का खर्च उठाना बेहद मुश्किल होता जा रहा था.लेकिन छोटे बेटे आशीष ने हर कदम पर कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ दिया.
जब मां ने मांगी 'मुक्ति' तो पिता का फटा कलेजा
एक समय ऐसा आया जब हरीश की मां ने उनकी असहनीय पीड़ा को देखते हुए इच्छा मृत्यु की बात कही जिसे सुनकर पिता पहले तो रो पड़े और इसे 'जीव हत्या' बताया। लेकिन जब डॉक्टर्स ने साफ कह दिया कि दिमाग की नसें सूख चुकी हैं और ठीक होने की कोई गुम्मीद नहीं है, तब भारी मन से परिवार ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
एम्स में विदाई की प्रक्रिया शुरू
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद अब एम्स के 'पेलिएटिव केयर यूनिट में हरीश को रखा गया है. जानकारी के अनुसार जीवन रक्षक उपकरणों को धीरे-धीरे हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. एम्स प्रशासन ने माता-पिता को भी अस्पताल में कमरा दिया है ताकि वे अपने बेटे के अंतिम पलों में उसके साथ रह सकें.
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