जब पहली बार बेटे हरीश राणा के लिए इच्छामृत्यु मांगे थे उनके पिता...रो-रोकर उन्होंने बताई पूरी कहानी

Harish Rana Case Story:13 साल से कोमा में जंग लड़ रहे हरीश राणा के परिवार की भावुक कहानी. डॉक्टरों द्वारा उम्मीद छोड़ने के बाद पिता ने कोर्ट से मांगी इच्छा मृत्यु की अनुमति. एम्स में शुरू हुई विदाई की प्रक्रिया.

यूपी तक

18 Mar 2026 (अपडेटेड: 18 Mar 2026, 03:20 PM)

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Harish Rana Case Story: यह कहानी है हरीश राणा और उनके उस परिवार की जिसने पिछले 13 वर्षों को उम्मीद और हकीकत की कशमकश में जिया है. साल 2013 में हुए एक हादसे ने होनहार छात्र हरीश को गहरी और अंतहीन नींद (कोमा) में सुला दिया. हर दिन माता-पिता इस आस में जागते कि शायद आज उनका बेटा आंखें खोल दे.लेकिन समय बीतने के साथ डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि वापसी की उम्मीद अब न के बराबर है.बेटे को तिल-तिल कर तड़पते देख, एक लाचार पिता ने पत्थर जैसा कलेजा कर अदालत का दरवाजा खटखटाया. अब लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, कोर्ट की अनुमति से धीरे-धीरे जीवन रक्षक उपकरण हटाए जा रहे हैं ताकि हरीश को इस असहनीय शारीरिक कष्ट से हमेशा के लिए मुक्ति मिल सके.

एक हादसा और ठहर गई पूरी जिंदगी

साल 2013 तक हरीश राणा एक आम युवक की तरह सपनों से भरे हुए थे. लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसे ने सब कुछ बदल दिया. सिर में लगी गंभीर चोट के कारण वे कोमा में चले गए.पिछले 13 सालों से उनकी सांसें मशीनों के भरोसे चल रही थीं. परिवार ने अपनी पूरी जमापूंजी और जीवन के सबसे बेहतरीन साल हरीश की सेवा में लगा दिए.लेकिन बिस्तर पर पड़े बेजान शरीर में कोई हलचल नहीं हुई.

उम्मीद की हार और 'इच्छा मृत्यु' की गुहार

जब मेडिकल साइंस ने हाथ खड़े कर दिए और डॉक्टरों ने स्थिति को 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' बताया. तब परिवार के सामने बड़ा धर्मसंकट खड़ा हुआ. एक तरफ बेटे का मोह था और दूसरी तरफ उसकी अंतहीन पीड़ा. अंततः पिता ने फैसला किया कि वे अपने बेटे को अब और तड़पते नहीं देख सकते.उन्होंने अदालत से 'पैसिव यूथेनेशिया' यानी इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगी ताकि उसे गरिमापूर्ण विदाई मिल सके.

अदालत का मानवीय फैसला और एम्स की प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हरीश को दर्द से मुक्ति देने की अनुमति दी. वर्तमान में हरीश दिल्ली के एम्स (AIIMS) में भर्ती हैं. कोर्ट के आदेशानुसार, यह कोई अचानक होने वाली प्रक्रिया नहीं है बल्कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में जीवन रक्षक प्रणालियों को धीरे-धीरे हटाया जा रहा है ताकि प्रकृति अपना रास्ता खुद तय करे. यह प्रक्रिया मानवता और कानून के बीच एक गहरा संतुलन है.

अंग दान की मिसाल और अमर प्रेम

हरीश के पिता ने भावुक होकर यह भी इच्छा जताई है कि उनके बेटे के अंग किसी जरूरतमंद के काम आ सकें. उनका मानना है कि अगर उनके बेटे की वजह से किसी और का जीवन बचता है तो वे उस शख्स में अपने हरीश को जिंदा देख सकेंगे. यह फैसला उस प्यार की मिसाल है जो कभी हार नहीं मानता. फिर चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठोर क्यों न हों.