साल 2013 में एक हादसे के बाद कोमा (वेजिटेटिव स्टेट) में गए हरीश राणा के लिए 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला आया जिसने एक पिता की सबसे कठिन मांग को स्वीकार कर लिया. अदालत ने हरीश को पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी. यह कोई अचानक होने वाली घटना नहीं बल्कि एक बेहद संवेदनशील और धीमी प्रक्रिया है. एम्स के विशेष डॉक्टरों की निगरानी में अब वह समय आ गया है जब मशीनों के सहारे चल रही उनकी सांसों को प्रकृति के हवाले कर दिया जाएगा.
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एम्स में विशेषज्ञों की विशेष टीम तैयार
हरीश राणा को दिल्ली के एम्स स्थित 'डॉ. बी.आर. अंबेडकर इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर हॉस्पिटल' की पैलिएटिव केयर यूनिट में रखा गया है.डॉ. सीमा मिश्रा के नेतृत्व में एक विशेष टीम बनाई गई है जिसमें न्यूरोसर्जरी, ऑनको एनस्थीसिया और मनोचिकित्सा के विशेषज्ञ शामिल हैं. यह टीम सुनिश्चित कर रही है कि हरीश को विदाई के दौरान कम से कम शारीरिक और मानसिक कष्ट हो.
धीरे-धीरे हटाए जाएंगे जीवन रक्षक उपकरण
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, यह प्रक्रिया इंजेक्शन देकर मौत देने जैसी नहीं है. इसमें जीवन को बनाए रखने वाले कृत्रिम पोषण (Artifical Nutrition) और अन्य सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से कम किया जाता है. डॉक्टरों का कहना है कि यह प्रक्रिया 2 से 3 हफ्ते तक चल सकती है. इस दौरान मरीज को 'पैलिएटिव सिडेशन' दिया जाता है ताकि उन्हें किसी भी तरह का दर्द महसूस न हो.
13 साल की लंबी और दर्दनाक जंग
हरीश राणा साल 2013 में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान चौथी मंजिल से गिर गए थे. सिर में गंभीर चोट के कारण वे कोमा में चले गए. पिछले 13 वर्षों से उनका परिवार हर दिन एक चमत्कार की उम्मीद में उनके पास बैठता था.उनसे बातें करता था. लेकिन जब डॉक्टरों ने वापसी की कोई संभावना नहीं बताई तो पिता ने भारी मन से उन्हें इस दर्द से मुक्त करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया.
"सबको माफ कर अब जाओ"
सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक हालिया वीडियो ने पूरे देश को झकझोर दिया है. घर से एम्स ले जाते वक्त परिवार ने उनके माथे पर तिलक लगाया और बेहद रुंधे गले से कहा "सबको माफ करते हुए, सबसे माफी मांगते हुए अब जाओ." ये शब्द 13 साल के संचित दर्द और अपने जिगर के टुकड़े को शांति से विदा करने की हिम्मत का प्रतीक बन गए हैं.
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