गोरखपुर के आनंद दीक्षित 2.5 साल से पड़े हैं अचेत, आखिरी आस में संघर्ष कर रहे इनके पिता की कहानी रुला देगी

गोरखपुर में बाइक एक्सीडेंट के बाद 2 साल से कोमा (वेजिटेटिव स्टेट) में है 35 साल का आनंद. पिता ने इलाज में 4 करोड़ रुपये और अपनी सारी संपत्ति गंवा दी, अब इंश्योरेंस कंपनी ने भी क्लेम देने से मना किया.

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19 Mar 2026 (अपडेटेड: 19 Mar 2026, 10:27 AM)

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हरीश राणा. ये वो नाम है जो इस वक्त चर्चा के केंद्र में है. सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद हरीश को अब इच्छा मृत्यु दी जाएगी. 13 सालों से कोमा में पड़े हरीश के माता-पिता ने अपने बेटे के लिए जो कुछ भी किया वो एक नजीर है. हरीश से मिलती जुलती एक और कहानी सामने आई है. 70 साल के वीरेंद्र दीक्षित के लिए इससे बड़ा दर्द क्या होगा कि उनका जवान बेटा सामने तो है लेकिन वह न बोल सकता है और न ही देख सकता है. वीरेंद्र दीक्षित और उनकी पत्नी पिछले दो सालों से इसी अंतहीन इंतजार में हैं कि उनका 35 साल का बेटा आनंद दीक्षित एक दिन अपनी आंखें खोलेगा और उन्हें पुकारेगा. 29 दिसंबर 2023 को गोरखपुर में हुए एक भीषण बाइक हादसे ने इस हंसते-खेलते परिवार की दुनिया उजाड़ दी थी. 

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घर को ही बना दिया गया है अस्पताल

हादसे के बाद आनंद को गोरखपुर से मुंबई शिफ्ट किया गया. आनंद कभी रियल एस्टेट कंसल्टेंट के रूप में काम करते थे. अफसोस की बात बस अब यही है कि आज वह वेजिटेटिव स्टेट यानी अचेतन अवस्था में हैं. उन्हें 24 घंटे मेडिकल निगरानी की जरूरत होती है. वीरेंद्र दीक्षित ने अपने घर में ही अस्पताल जैसा सेटअप तैयार किया है, जिसमें मॉनिटर, फीडिंग ट्यूब और लाइफ-सपोर्ट उपकरण लगे हैं. पिता वीरेंद्र कहते हैं, "हमें विश्वास है कि वह एक दिन जरूर जागेगा. हमारा भरोसा ही हमें आगे बढ़ा रहा है."

अब तक इलाज में खर्च हुए 4 करोड़, संपत्ति तक बेचनी पड़ी

इस लंबी लड़ाई ने परिवार को आर्थिक रूप से तोड़कर रख दिया है. अब तक आनंद के इलाज और देखभाल पर करीब 4 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. इस भारी खर्च को उठाने के लिए परिवार को अपनी हर एक संपत्ति बेचनी पड़ी. वीरेंद्र दीक्षित ने बताया कि जब वे आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे, तब हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी ने भी उनका क्लेम रिजेक्ट कर दिया जिससे उन पर आर्थिक बोझ और बढ़ गया.

पिता ने रख रखा है 90000 रुपये महीने पर केयरटेकर

मुसीबतों ने परिवार का पीछा यहीं नहीं छोड़ा. पिछले साल मुंबई में उनकी जर्जर इमारत को प्रशासन ने गिरा दिया, जिससे पुनर्विकास का काम भी रुक गया. अब वीरेंद्र किसी तरह किराए के पैसे जुटाकर एक छत के नीचे अपने बेटे की देखभाल कर रहे हैं. आनंद की नाजुक स्थिति को देखते हुए उन्होंने 90000 रुपये महीने पर एक केयरटेकर रखा है. पिता का कहना है कि आनंद की स्थिति में एक छोटी सी लापरवाही भी जानलेवा हो सकती है, इसलिए विशेषज्ञ निगरानी अनिवार्य है. 

मुस्तफा शेख के इनपुट के साथ.