गाजीपुर में दो दारोगा सस्पेंड, लखनऊ की इस कंपनी को बचाने के लिए खतरे में डाल दी सरकारी नौकरी

यूपी तक

• 12:45 PM • 07 Jul 2026

गाजीपुर में भर्ती प्रक्रिया से जुड़े कथित फर्जी दस्तावेज मामले में लापरवाही और आरोपियों को लाभ पहुंचाने के आरोप में दो सब-इंस्पेक्टर निलंबित कर दिए गए हैं. डीआईजी वैभव कृष्ण ने मामले की विभागीय जांच के आदेश दिए हैं.

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Ghazipur News: उत्तर प्रदेश पुलिस में भ्रष्टाचार और लापरवाही के खिलाफ एक बार फिर बड़ा डंडा चला है. गाजीपुर में भर्ती प्रक्रिया के दौरान फर्जी दस्तावेजों के जरिए धोखाधड़ी करने वाली कंपनियों को बचाने के आरोप में दो सब-इंस्पेक्टर्स को सस्पेंड कर दिया गया है. वाराणसी रेंज के डिप्टी जनरल ऑफ पुलिस (DIG) वैभव कृष्ण ने सोमवार को यह सख्त कदम उठाया.

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निलंबित किए गए पुलिस अधिकारियों में गाजीपुर कोतवाली थाने में तैनात सब-इंस्पेक्टर रोहित कुमार और जितेंद्र कुमार उपाध्याय शामिल हैं. दोनों पर आरोप है कि उन्होंने रिक्रूटमेंट फ्रॉड से जुड़े सात गंभीर मामलों की जांच को जानबूझकर कमजोर करने और आरोपियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की.

इस कार्रवाई के बाद पूरे महकमे में हड़कंप मच गया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर वे कौन सी रसूखदार कंपनियां थीं, जिन्हें बचाने के लिए इन दारोगाओं ने अपनी नौकरी ही दांव पर लगा दी? और इस पूरे खेल के पीछे का मास्टरमाइंड कौन है?

176 कंपनियों में से 7 ने लगाया था 'फर्जीवाड़ा' का चूना

इस पूरे मामले की शुरुआत 25 फरवरी 2025 को हुई थी, जब गाजीपुर शहर के ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) ने एक शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत के मुताबिक, अनुदेशकों की भर्ती के लिए टेंडर प्रक्रिया निकाली गई थी. इस टेंडर में कुल 176 कंपनियों ने आवेदन किया था.

जांच के दौरान पता चला कि इनमें से 7 कंपनियों ने टेंडर हासिल करने के लिए बैंक के फर्जी सर्टिफिकेट और जाली दस्तावेज जमा किए थे. यह सीधे तौर पर सरकारी सिस्टम को धोखा देने का बड़ा मामला था.

लखनऊ की कंपनी को बचाने की थी 'जल्दबाजी'?

सोमवार को जब डीआईजी वैभव कृष्ण ने इन मुकदमों की प्रोग्रेस रिपोर्ट की समीक्षा की तो पुलिस फाइलों का खेल देखकर वह भी हैरान रह गए. समीक्षा में पाया गया कि बिना किसी ठोस आधार या पुख्ता वजह के, उन सभी सात आरोपी कंपनियों को जांच के दायरे से बाहर कर दिया गया था.

आधिकारिक आदेश के अनुसार, जांच में खासतौर पर लखनऊ की एक कंपनी 'वंशिका एचआर सर्विस' को क्लीनचिट देने और उसे बचाने की पुरजोर कोशिश की गई थी.

इतना ही नहीं, मामला बेहद गंभीर होने के बावजूद दोनों जांच अधिकारियों ने बिना गहराई से तफ्तीश किए, आनन-फानन में केस की फाइनल रिपोर्ट लगाने की तैयारी कर ली थी ताकि मामला रफा-दफा हो सके. इसे प्रथम दृष्टया कर्तव्य में गंभीर लापरवाही और भ्रष्टाचार मानते हुए दोनों को तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया गया.

30 दिनों में आएगी पूरी सच्चाई बाहर

डीआईजी वैभव कृष्ण ने इस मामले की विस्तृत जांच के आदेश गाजीपुर सिटी के डिप्टी एसपी को सौंपे हैं. जांच अधिकारी को पूरे मामले की तह तक जाकर 30 दिनों के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है. फिलहाल दोनों दरोगाओं के खिलाफ विभागीय जांच भी शुरू कर दी गई है. यूपी पुलिस का यह एक्शन साफ संदेश है कि खाकी में रहकर दागियों को बचाने वालों की अब खैर नहीं है.