Welcome 2026: CM योगी के लिए अगले 400 दिन क्यों किसी चक्रव्यूह से कम नहीं, समझिए सबसे बड़ी सियासत

2026 योगी आदित्यनाथ के लिए 2027 का सेमीफाइनल साबित होगा. पंचायत चुनाव, घोसी उपचुनाव, अखिलेश यादव के PDA, हिंदुत्व की धार और NDA सहयोगियों को साधने की चुनौती, यूपी की सत्ता की अग्निपरीक्षा.

CM Yogi

रजत कुमार

• 02:22 PM • 01 Jan 2026

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जीत की हैट्रिक या हार की मायूसी. आने वाले साल में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इसी सवाल से सबसे ज्यादा जूझना है. लेकिन जवाब की मंजिल तक पहुंचने से पहले उनके रास्ते के जो अहम पड़ाव रहेंगे वो हैं, साल 2026 के पंचायत चुनाव, अखिलेश यादव के पीडीए का तोड़, गठबंधन साथियों से संतुलन, पार्टी औऱ संगठन में तालमेल. कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के गली-कूचों में हमेशा राजनीति हवा के साथ बहती है. अगर साल चुनावी हो तो राजनीति की चाल हवा से भी तेज होना लाजिमी है. ऐसे में करीब 9 साल से यूपी की सत्ता पर काबिज सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ अगले 400 दिन किसी चक्रव्यूह से कम नहीं होंगे. 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले झटके से उबरने के लिए योगी को पूरा एक साल मिला. 2025 में  उन्होंने मिल्कीपुर उपचुनाव की जीत, कानून व्यवस्था की मजबूत छवि, हिंदुत्व के दांव और विकास के व्याकरण से विरोधी नेता अखिलेश यादव के पीडीए का तगड़ा जवाब पेश किया. अब सवाल 2026 का है. सबसे पहले सामने घोसी उपचुनाव और पंचायत चुनाव की चुनौती है. लेकिन योगी के निशाने पर 2027 की सत्ता है. जिसका सपना भी वो विरोधी नेताओं को देखने की इजजात नहीं देते.

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PDA का तोड़ कैसे निकालेंगे?

अखिलेश यादव का PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्क का दांव 2026 में भी योगी को ललकारेगा. इस बार अखिलेश यादव के पीडीए पिटारे में अच्छे अगड़े और पी से पंडित जी भी हैं. अखिलेश लगातार योगी आदित्यनाथ को एक जाति विशेष से जोड़कर निशाने पर ले रहे हैं. वहीं, बीजेपी के अंदर अलग-अलग जातियों की मीटिंग भी विवाद खड़ी कर रही है. इतना ही नहीं, अगर सवर्ण कही जाने वाली जातियों को छोड़ दिया जाए तो पिछले चुनावों में गैर-यादव ओबीसी और दलित वोट का सपा या INDIA गठबंधन के साथ जाना भी एक चुनौती है. जो कुर्मी-कोइरी 2022 के विधानसभा में करीब 65% बीजेपी के साथ था. वो 2024 में घटकर 61% हो गया. वहीं, सपा 23% से बढ़कर 34% पर पहुंच गई. ऐसे में बीजेपी ने कुर्मी प्रदेश अध्यक्ष बनाकर एक दांव खेला है. 

दलित वोटों की बात की जाए, तो यहां चिंता और भी ज्यादा है. गैर जाटव वोटर ने 2022 में बीजेपी को 41% वोट दिया था और सपा गठबंधन को 23%. लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में गैर जाटव वोटर  में बीजेपी गठबंधन का हिस्सा घटकर 29% पर आ गया. लेकिन सपा गठबंधन 23% से बढ़कर 56% पर पहुंच गया. इसके अलावा जाटव वोट में भी सपा गठबंधन 9% बढ़कर 25% पहुंच गया है. लेकिन इस चुनौती से निपटने के लिए योगी आदित्यनाथ का नारा है, बटोगे, तो कटोगे. इस नारे का असर, बिहार, महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा तक में भी देखने को मिला.

हिदुंत्व की धार और तेज करेंगे योगी

योगी आदित्यनाथ देश के इकलौते मुख्यमंत्री हैं, जो एक मठ के मुखिया हैं. वो योगी हैं और संन्यासी भी. बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति में आज के समय में वो सबसे आगे हैं. स्वाभाविक तौर पर यूपी में लगातार हिंदुत्व वाली राजानीति की धार देखने को मिलती है. विपक्षी पार्टियां लगातार योगी आदित्यनाथ के हिंदुत्व के बरक्स व्यक्तिवाद और जातिवाद के आरोप जड़ती हैं. एनकाउंटर में आरोपियों की जाति गिननी हो, थाने में थानेदारों का सरनेम गिनना हो या फिर कथित बाहुबलियों पर संरक्षण के आरोप लगाना हो. हिंदुत्व के साथ योगी आदित्यनाथ का सबसे प्रबल हथियार है सुरक्षा. इसके लिए वो समाजावादी पार्टी को सीधे माफिया से जोड़ते हैं, और ‘बरेली के मौलाना’ को सामने करते हैं. यानी सुरक्षा और हिंदुत्व का शानदार मिश्रण है. 2026 में भी विपक्षियों को योगी आदित्यनाथ के इन्हीं  तेवरों से निपटना होगा.

पार्टनर या दोस्त, ये पॉलिटिक्स भी करनी होगी

2027 से पहले 2026 में योगी आदित्यनाथ के सामने एक और चुनौती मुंह बाएं खड़ी है. ये है साझेदारों को साथी बनाना. यूपी NDA में ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, संजय निषाद की निषाद पार्टी, अनुप्रिया पटेल की अपना दल सोनेलाल और जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल हैं. 2026 में योगी आदित्यनाथ के सामने इन साझेदारों को साथी बनाने की जरूरत है. क्योंकि 2025 में अलग-अलग मौके पर अलग-अलग पार्टी के नेताओं ने अपने तेवर भी बीजेपी को दिखाए. अपना दल के आशीष पटेल के निशाने पर यूपी एसटीएफ और सरकार रहीं. वहीं, संजय निषाद यहां तक कह गए कि अगर बीजेपी को जरूरत ना हो तो बता दें. हम अपना रास्ता देखेंगे. 

वहीं, मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी की जयंत चौधरी से तरकार. तो संगीत सोम और संजीव बालियान जैसे नेताओं के निशाने पर लगातार RLD को होना भी एक दिक्कत रही है. बिहार चुनाव में ओपी राजभर में सीट मांगते रहे. लेकिन बीजेपी ने एक भी नहीं सुनी. ऐसे में घोसी उपचुनाव में एक बार फिर ओपी राजभर इसी तरीके एक बार दबाव बनाएंगे. अब इन साथियों को साधने की भी चुनौती रहेगी. 

2027 का सेमीफाइनल

2026 में योगी आदित्यनाथ को दो चुनावी परीक्षा भी देनी होगी. पहली परीक्षा पंचायत चुनाव की होगी. पंचायत चुनाव में ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाता वोट देते हैं. जहां समाजवादी पार्टी अपेक्षाकृत मजबूत है. ऐसे में एक बार फिर विधानसभा चुनाव से पहले सीएम योगी को यहां बीजेपी को आगे बढ़ाना होगा. ना सिर्फ सपा बल्कि रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया, धनंजय सिंह समेत कई क्षेत्रीय क्षत्रपों से भी निपटना होगा, जो इन चुनाव में अपने इलाके में प्रभावशाली हो जाते हैं.

दूसरा चुनाव घोसी का उपचुनाव है. घोसी वो सीट है, जहां से 2024 की हार की पटकथा लिखी गई. अब एक बार फिर उसी विधानसभा में उपचुनाव है. सपा ने इस बार 2023 उपचुनाव के विजेता सुधाकर सिंह के बेटे सुजीत सिंह को मैदान में उतारा है. लेकिन अभी बीजेपी प्रत्याशी भी तय नहीं कर पाई है. अगर 2027 विधानसभा चुनाव जीतकर बीजेपी योगी आदित्यनाथ को फिर से सीएम बनाती है तो वो आजाद भारत में उत्तर प्रदेश के लगातार तीसरी बार बनने वाले पहले मुख्यमंत्री होंगे. इस मुकाम को हासिल करने का कोई मौका योगी छोड़ना नहीं चाहेंगे. उस कोशिश में योगी का योग भी शामिल होगा राजनेता की राजनीति भी.

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