UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में अभी कई महीने बाकी हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है. एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की तैयारी कर रही है, तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी 2024 लोकसभा चुनाव में मिले प्रदर्शन को विधानसभा तक ले जाने की कोशिश में जुटी है.
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इसी बीच 'रुद्र रिसर्च एंड एनालिटिक्स, पुणे' ने उत्तर प्रदेश की राजनीति पर एक डिटेल ग्राउंड स्टडी जारी की है. रिपोर्ट में पिछले चुनावों के नतीजों, जातीय समीकरणों, राजनीतिक मुद्दों और दलों की रणनीति के आधार पर समझने की कोशिश की गई है कि 2027 के चुनाव में किसकी ताकत क्या है और किसके सामने सबसे बड़ी चुनौती कौन-सी होगी.
रिपोर्ट क्या कहती है?
रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा समय में भाजपा की स्थिति उत्तर प्रदेश में मजबूत दिखाई देती है. इसकी बड़ी वजह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कानून-व्यवस्था वाली छवि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव, सरकारी योजनाओं के लाभार्थी, हिंदुत्व और मजबूत संगठन को माना गया है. हालांकि रिपोर्ट यह भी कहती है कि बेरोजगारी, महंगाई, भर्ती प्रक्रिया, पेपर लीक और स्थानीय नाराजगी जैसे मुद्दे भाजपा के लिए चुनौती बन सकते हैं.
2022 से 2024 तक कैसे बदली तस्वीर?
रिपोर्ट के अनुसार, 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले NDA ने 270 से ज्यादा सीटें जीती थीं, जबकि समाजवादी पार्टी गठबंधन को 125 सीटें मिली थीं.
फिर 2024 लोकसभा चुनाव में तस्वीर बदली. इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटें जीत लीं, जबकि NDA 36 सीटों पर सिमट गया. रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले, सपा-कांग्रेस गठबंधन और वोटों के कम बंटवारे का असर देखने को मिला.
वोट शेयर क्या बताते हैं?
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 से 2024 के बीच NDA का वोट शेयर करीब 42 से 44 प्रतिशत के बीच बना रहा.
वहीं समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन का वोट शेयर लगातार बढ़ा और 2024 तक करीब 43 प्रतिशत तक पहुंच गया. दूसरी ओर बसपा का वोट शेयर लगातार घटा है, जिसका फायदा इंडिया गठबंधन को मिलता दिखाई देता है.
सबसे बड़ा मुकाबला किसके बीच?
रिपोर्ट के अनुसार, 2027 में मुख्य मुकाबला भाजपा के नेतृत्व वाले NDA और समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन के बीच रहने की संभावना है.
NDA में भाजपा के साथ RLD, अपना दल (सोनेलाल), निषाद पार्टी और SBSP शामिल हैं. वहीं समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस के गठबंधन की संभावना जताई गई है, हालांकि सीटों के बंटवारे पर अभी फैसला नहीं हुआ है. बसपा के अलग चुनाव लड़ने की भी संभावना बताई गई है.
जातीय समीकरण कितना अहम?
रिपोर्ट में अनुमानित सामाजिक समीकरण का भी जिक्र किया गया है. इसमें मुस्लिम मतदाता करीब 20 प्रतिशत, यादव 10 प्रतिशत, अन्य OBC 29 प्रतिशत, जाटव 11 प्रतिशत, अन्य SC 10 प्रतिशत, ब्राह्मण 9 प्रतिशत और ठाकुर 6 प्रतिशत बताए गए हैं.
रिपोर्ट का कहना है कि भाजपा की ताकत गैर-यादव OBC, गैर-जाटव दलित और सवर्ण मतदाताओं में रही है. वहीं समाजवादी पार्टी PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के जरिए अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है.
भाजपा की रणनीति क्या?
रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा मोदी-योगी नेतृत्व, कानून-व्यवस्था, मुफ्त राशन, आवास, महिला सुरक्षा, धार्मिक पर्यटन, निवेश और सरकारी योजनाओं को चुनावी मुद्दा बनाएगी.
इसके साथ ही पार्टी बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने और सहयोगी दलों के साथ सामाजिक समीकरण बनाए रखने पर भी जोर दे रही है.
सपा किस दांव पर खेल रही है?
रिपोर्ट के अनुसार समाजवादी पार्टी PDA फॉर्मूले के जरिए यादव-मुस्लिम वोटों के साथ गैर-यादव OBC, दलित और युवाओं को जोड़ने की कोशिश कर रही है.
पार्टी बेरोजगारी, महंगाई, जातीय जनगणना, सामाजिक न्याय और संविधान जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है. साथ ही अखिलेश यादव अपने कार्यकाल की योजनाओं को भी जनता के बीच रख रहे हैं.
बसपा और कांग्रेस की क्या स्थिति?
रिपोर्ट कहती है कि बसपा संगठन को फिर से मजबूत करने की कोशिश में जुटी है, लेकिन उसका घटता वोट प्रतिशत पार्टी के सामने बड़ी चुनौती है. वहीं कांग्रेस 2024 लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद संगठन मजबूत करने पर ध्यान दे रही है. पार्टी की कोशिश भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट रखने की है.
छोटे दल भी बन सकते हैं गेमचेंजर
रिपोर्ट के मुताबिक अपना दल (सोनेलाल), निषाद पार्टी, SBSP, RLD और आजाद समाज पार्टी जैसे छोटे दल कई सीटों पर चुनाव का परिणाम प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए इनके समीकरण भी चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगे.
रिपोर्ट का निष्कर्ष
रुद्र रिसर्च एंड एनालिटिक्स का निष्कर्ष है कि फिलहाल उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्थिति मजबूत नजर आती है. हालांकि बेरोजगारी, महंगाई, भर्ती, पेपर लीक, PDA राजनीति और बसपा के वोट बैंक का रुख चुनावी मुकाबले को दिलचस्प बना सकता है.
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