उत्तर प्रदेश में आगामी पंचायत चुनावों को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है. हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में हुई सुनवाई के दौरान यह साफ हो गया है कि प्रदेश में पंचायत चुनाव से पहले पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया जाएगा. राज्य सरकार ने इस संबंध में कोर्ट को अपना रुख स्पष्ट कर दिया है.
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पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के बाद ही होंगे चुनाव
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में जस्टिस राजन राय और जस्टिस अवधेश चौधरी की कोर्ट इस मामले की सुनवाई कर रही थी. उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को लेकर दाखिल की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान सरकार ने हलफनामा दाखिल किया. सरकार ने कोर्ट को बताया कि पंचायत चुनाव से पहले पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया जाएगा और इसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा.
राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत चुनाव के विभिन्न स्तरों के प्रत्याशियों के लिए अधिकतम चुनावी खर्च सीमा निर्धारित कर दी है. ऐसे में आज हम आपको ग्राम प्रधान को लेकर इस बात की तफ्सीली जानकारी देंगे कि चुनाव से पहले उम्मीदवार कितना अधिकतम पैसा खर्च पांएगे.
ग्राम प्रधान के लिए उम्मीदवार कितना खर्च कर सकेंगे?
सबसे पहले आपको यह बता दें कि जो प्रत्याशी ग्राम प्रधान के लिए उम्मीदवारी पेश करेंगे वो चुनाव प्रचार में अधिकतम 1.25 लाख रुपये खर्च कर पाएंगे.
ग्राम प्रधान को मिलता है कितना फंड?
उत्तर प्रदेश में एक ग्राम प्रधान को कई स्रोतों से पैसा अलॉट होता है. यह पैसा ग्राम पंचायत के खाते में आता है जिसे प्रधान और अन्य अधिकारियों के संयुक्त हस्ताक्षर से खर्च किया जाता है. आमतौर पर जिस ग्रामसभा की आबादी लगभग 2000 है उसे केंद्र के 15वें वित्त आयोग और राज्य वित्त आयोग से मिलाकर लगभग 20 से 40 लाख रुपये तक सालाना मिलते हैं. इस अनुमान के आधार पर 5 साल में यह राशि लगभग 1 से 2 करोड़ तक जा सकती है.
और कहां-कहां से मिलता है फंड?
- MNREGA: यह पैसा मुख्य तौर पर मजदूरी के लिए खर्च किया जाता है. इसका बजट सालाना 10 लाख से 15 लाख हो तक हो सकता है. यानी 5 साल में 50 लाख से 75 लाख.
- स्वच्छ भारत मिशन, जल जीवन मिशन, राज्य/मुख्यमंत्री योजना आदि के तहत भी अलग से पैसा आता है जो हर साल 5 लाख से 10 लाख या उससे ज्यादा हो सकता है.
5 साल में क्या होती है कुल अनुमानित राशि?
एक औसत आबादी वाली ग्राम पंचायत को विभिन्न मदों (जैसे 15वां वित्त आयोग, मनरेगा, राज्य योजनाएं) को मिलाकर 5 साल के कार्यकाल में मोटे तौर पर 2 से 5 करोड़ तक का फंड मिलता है. यह फंड पंचायत के आकार और सरकार द्वारा जारी बजट की उपलब्धता के आधार पर कम या ज्यादा हो सकता है.
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