Aliganj Fire: लखनऊ के अलीगंज में 22 जून को हुए भीषण अग्निकांड के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार को नया निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा है कि प्राकृतिक आपदाओं के अलावा होने वाली घटनाओं में मुआवजा तय करने के लिए सरकार को साफ नीति और मानक बनाने पर विचार करना चाहिए.
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कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग मामलों में अलग-अलग रकम का भुगतान किया जाएगा तो इससे भेदभाव और मनमानी की स्थिति पैदा हो सकती है. मामले की अगली सुनवाई अब 15 अक्टूबर 2026 को होगी.
15 मृतकों के परिवारों को करीब 11-12 लाख रुपये मिले
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजिव शुक्ला की बेंच ने ये आदेश शिवेंदु पांडे की ओर से दाखिल जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए दिया. याचिका अलीगंज अग्निकांड से जुड़ी है.
कोर्ट को बताया गया कि 22 जून को लगी आग में जान गंवाने वाले 15 लोगों के परिवारों को अलग-अलग स्रोतों से करीब 11 लाख से 12 लाख रुपये तक की आर्थिक मदद मिली है. इसमें मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से 5 लाख रुपये, राज्य आपदा मोचन निधि (SDRF) से 4 लाख रुपये और प्रधानमंत्री राहत कोष से 2 लाख रुपये शामिल हैं.
हालांकि, पीड़ित परिवारों की ओर से कोर्ट को बताया गया कि कुछ परिवारों को प्रधानमंत्री राहत कोष से मिलने वाली 2 लाख रुपये की सहायता अभी तक नहीं मिली है. इस पर कोर्ट ने केंद्र सरकार के वकील वरुण पांडे को तथ्यों की जांच करने को कहा.
सरकार से पूछा- अब तक मिला मुआवजा कम क्यों है?
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है कि पीड़ित परिवारों को अब तक दी गई आर्थिक मदद को पर्याप्त क्यों माना जाए और मुआवजे की रकम बढ़ाई क्यों नहीं जानी चाहिए.
कोर्ट ने साफ कहा कि जिन घटनाओं के लिए किसी कानून या सरकारी योजना के तहत मुआवजे का प्रावधान नहीं है, उनमें भी मुआवजा तय करने के लिए सरकार को एक स्पष्ट नीति बनानी चाहिए.
इसका मतलब है कि भविष्य में अगर कोई ऐसी घटना होती है जो प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में नहीं आती और उसके लिए कोई तय कानूनी प्रावधान नहीं है, तो सरकार के पास मुआवजा तय करने का कोई स्पष्ट आधार होना चाहिए.
मोटर एक्सीडेंट के मुआवजे का फॉर्मूला हो सकता है आधार
सुनवाई के दौरान वकील अपूर्वा तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट के तीन फैसलों का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि जहां मुआवजे को लेकर कोई नीति या कानूनी व्यवस्था नहीं है, वहां मोटर दुर्घटना मामलों में अपनाए जाने वाले सिद्धांतों को आधार बनाया जा सकता है.
कोर्ट ने इस दलील पर ध्यान दिया और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि इन तीनों सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को ध्यान में रखते हुए अपना पक्ष रखे. सरकार को अब एक हलफनामा दाखिल कर बताना होगा कि अभी तक कितना मुआवजा दिया गया है और मुआवजे की रकम बढ़ाई क्यों नहीं जानी चाहिए.
25 साल के जयंत की हालत ने कोर्ट को किया भावुक
सुनवाई में अलीगंज अग्निकांड में गंभीर रूप से घायल हुए 25 वर्षीय जयंत गुप्ता का मामला भी सामने आया. आग में जयंत को गंभीर चोटें आईं और वह दिव्यांगता का भी शिकार हुए हैं. फिलहाल उनका इलाज किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में चल रहा है.
पीड़ितों की ओर से कोर्ट को बताया गया कि जयंत के इलाज पर हर महीने करीब 70 हजार रुपये खर्च हो रहे हैं. इसके बावजूद उन्हें अब तक सिर्फ 50 हजार रुपये का मुआवजा मिला है. स्थिति सामने आने पर कोर्ट ने कहा कि कम से कम घायल युवक का इलाज तो राज्य सरकार को अपने खर्च पर कराना चाहिए.
KGMU जयंत से इलाज का पैसा नहीं लेगा
कोर्ट ने KGMU को निर्देश दिया कि जयंत से इलाज का कोई पैसा न लिया जाए. इलाज पर होने वाला खर्च राज्य सरकार के सामने रखा जाए और सरकार उसका भुगतान सुनिश्चित करे. कोर्ट ने साफ किया कि घायल युवक पर इलाज का खर्च नहीं डाला जाना चाहिए.
हादसे के लिए सिर्फ बिल्डिंग मालिक जिम्मेदार नहीं?
सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि पहली नजर में इस घटना की जिम्मेदारी केवल बिल्डिंग मालिक की लापरवाही तक सीमित नहीं मानी जा सकती. अधिकारियों की भूमिका पर भी विचार जरूरी है, क्योंकि आरोप है कि बिल्डिंग को अवैध तरीके से बनने और उसका व्यावसायिक इस्तेमाल होने की अनुमति दी गई.
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