अजगरा सीट से कौन लड़ेगा सपा या बीजेपी? इस नाम की सबसे ज्यादा हो रही चर्चा
वाराणसी की अजगरा विधानसभा सीट पर 2027 चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज है. त्रिभुवन राम, कैलाशनाथ सोनकर और संभावित गठबंधन के बीच मुकाबले की तस्वीर अभी साफ नहीं है. सीट के जातीय समीकरण भी चुनावी रणनीति में अहम माने जा रहे हैं.
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वाराणसी जिले की अजगरा (सुरक्षित) विधानसभा सीट पर आगामी 2027 के चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं. मछलीशहर से समाजवादी पार्टी की विधायक रागिनी सोनकर के पिता और सुभासपा के पूर्व विधायक कैलाशनाथ सोनकर की इस सीट पर संभावित वापसी की चर्चाओं ने मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है. 2012 के परिसीमन के बाद वजूद में आई इस सीट पर वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का कब्जा है. हालांकि बीजेपी-सुभासपा गठबंधन, बीएसपी के दावे और सपा के नए दांव के बीच अजगरा का राजनीतिक समीकरण उलझ गया है.
बीजेपी विधायक का विकास का दावा और बीएसपी का गद्दारी का आरोप
2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के त्रिभुवन राम (टी. राम) ने सुभासपा (तब सपा गठबंधन) के सुनील सोनकर को करीब 9100 वोटों के अंतर से हराया था.
त्रिभुवन राम का पक्ष: पूर्व बसपा नेता रहे और अब बीजेपी विधायक त्रिभुवन राम का कहना है कि उन्होंने क्षेत्र में लगातार विकास काम किए हैं और जनता के सुख-दुख में मौजूद रहे हैं. उन्हें भरोसा है कि जनता काम के आधार पर दोबारा मौका देगी.
बीएसपी का पलटवार: बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के स्थानीय नेताओं का आरोप है कि पार्टी सुप्रीमो मायावती ने त्रिभुवन राम को सब कुछ दिया. लेकिन उन्होंने समाज और बीएसपी के साथ धोखा किया. बीएसपी का दावा है कि 2012 में यह सीट बीएसपी ने ही जीती थी और इस बार उनका बूथ कैडर मजबूत है, इसलिए बीएसपी वापसी करेगी.
अजगरा का राजनीतिक इतिहास और 2027 के दावेदार
2012 में अस्तित्व में आने के बाद से इस सीट पर किसी एक पार्टी का वर्चस्व नहीं रहा है.
2012: त्रिभुवन राम (बसपा)
2017: कैलाशनाथ सोनकर (सुभासपा)
2022: त्रिभुवन राम (भाजपा)
क्या कैलाशनाथ सोनकर को मिलेगा सपा का टिकट?
कैलाशनाथ सोनकर की जमीनी पकड़ आज भी मजबूत मानी जाती है. अब चर्चा है कि क्या सपा उन्हें इस सीट से अपना प्रत्याशी बनाएगी? दूसरी ओर एनडीए गठबंधन में भी पेच फंसा है. ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा अजगरा को अपनी 'राजनीतिक जन्मभूमि' मानती है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी अपनी रनिंग सीट सुभासपा के लिए छोड़ेगी या खुद चुनाव लड़ेगी?
जातीय समीकरण: दलित और पिछड़ा वर्ग सबसे निर्णायक
अजगरा सीट पर हार-जीत की चाबी मुख्य रूप से दलित और पिछड़ी जातियों के हाथ में है.
दलित मतदाता: 1,25,000 (सबसे बड़ा वोट बैंक)
ब्राह्मण: 38,000
यादव: 35,000
कुर्मी/पटेल: 35,000
राजभर: 32,000
मुस्लिम: 30,000
कुशवाहा: 20,000
अन्य जातियां: लगभग 60,000
एंटी-इंकम्बेंसी कम, मुकाबला प्रत्याशी पर निर्भर
स्थानीय पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पूर्वांचल की अन्य सीटों की तुलना में अजगरा के विधायक त्रिभुवन राम के खिलाफ भारी एंटी-इंकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) नहीं है. उनका एजुकेशनल बैकग्राउंड और साफ-सुथरी छवि जनता के बीच उनकी सीधी पकड़ बनाए रखती है.
गठबंधन का धर्म संकट: सुभासपा और बीजेपी दोनों के साथ आने से एनडीए का वोट बैंक बढ़ा है, लेकिन सीट किसके खाते में जाएगी, यह देखना होगा.
निर्णायक मोड़: करीब 1.20 लाख से अधिक पिछड़ी जातियों और 1.25 लाख दलित वोटों के झुकाव पर ही 2027 का फैसला टिकेगा. आखिरकार चुनाव कितना कठिन होगा, यह पार्टियों द्वारा घोषित किए जाने वाले प्रत्याशियों के चेहरे पर ही निर्भर करेगा.
