Opinion: 1.71 लाख से 30 लाख दीयों तक पहुंचा अयोध्या का दीपोत्सव, आखिर कैसे बदल गई रामनगरी की पहचान?
Opinion: अयोध्या के दीपोत्सव में इस बार 30 लाख दीये जलाने की तैयारी है. 2017 में 1.71 लाख दीयों से शुरू हुआ यह आयोजन अब सिर्फ विश्व रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रहा. इसके जरिए रामनगरी की सांस्कृतिक पहचान, पर्यटन और स्थानीय कारोबार को कैसे बढ़ावा मिल रहा है?
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Opinion: अयोध्या में इस बार एक साथ 30 लाख दीये प्रज्वलित किए जाएंगे. रामनगरी में दीपोत्सव की शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी. पहले दीपोत्सव में महज 1.71 लाख दीये जलाए गए थे, लेकिन इसके बाद हर साल यह संख्या बढ़ती गई. वर्ष 2021 से अयोध्या का दीपोत्सव लगातार गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपनी जगह बना रहा है.
हालांकि, दीपोत्सव की पहचान अब केवल दीयों की बढ़ती संख्या और विश्व रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है. यह भारतीय संस्कृति, परंपरा और सभ्यतागत गौरव को नए सिरे से स्थापित करने का एक बड़ा अभियान बन चुका है.
सरयू के घाटों पर जब लाखों दीये एक साथ प्रज्वलित होते हैं, तो यह दृश्य केवल आंखों को आकर्षित नहीं करता, बल्कि भारत की उस सांस्कृतिक चेतना का भी स्मरण कराता है, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी परंपराओं में हैं. यह दृश्य त्रेता युग की उन स्मृतियों को जीवंत करता है, जब लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे थे और उनके स्वागत में पूरी नगरी दीपों से जगमगा उठी थी.
आज का दीपोत्सव उसी परंपरा की जीवंतता का प्रतीक है. इसके कई मायने हैं. यह आस्था का उत्सव है, विरासत के संरक्षण का प्रयास है, स्थानीय अर्थव्यवस्था को नए अवसर देने का माध्यम है और समाज को अपनी साझा सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने वाला आयोजन भी है.
अयोध्या की पहचान भगवान श्रीराम की जन्मभूमि के रूप में पूरी दुनिया में रही है. लेकिन आज रामनगरी की पहचान केवल एक धार्मिक नगरी तक सीमित नहीं है. यह भारतीय सभ्यता, परंपरा और सांस्कृतिक गौरव के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित हो रही है. दीपोत्सव ने इस पहचान को व्यापक मंच दिया है.
इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत को केवल किताबों में पढ़ नहीं रही, बल्कि उसे उत्सव के रूप में जी भी रही है. भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन की परंपरा से जुड़ा यह आयोजन लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है और दुनिया के सामने भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान प्रस्तुत करता है.
रामराज्य की सांस्कृतिक कल्पना और सामाजिक एकता का संदेश
दीपोत्सव भगवान श्रीराम के आदर्शों और रामराज्य की सांस्कृतिक कल्पना को भी साकार रूप में सामने रखता है. रामराज्य का विचार केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक समरसता, लोककल्याण, कर्तव्य और सबके सम्मान की भावना निहित है.
दीपोत्सव इसी सांस्कृतिक चेतना को सामूहिक उत्सव का रूप देता है. इसमें समाज के अलग-अलग वर्गों की भागीदारी भारतीय परंपरा की उस व्यापकता को दर्शाती है, जो लोगों को साझा विरासत के सूत्र में बांधती है. जब लाखों लोग एक साथ इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं, तो यह महज धार्मिक कार्यक्रम नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बन जाता है.
आस्था के साथ अर्थव्यवस्था को भी मिल रही नई रोशनी
दीपोत्सव का एक महत्वपूर्ण आयाम स्थानीय अर्थव्यवस्था भी है. लाखों दीयों का प्रज्वलन केवल प्रतीकात्मक आयोजन नहीं है, बल्कि इसके साथ कुम्हारों, स्थानीय कारीगरों, फूल कारोबारियों, छोटे दुकानदारों, होटल व्यवसायियों, परिवहन और पर्यटन से जुड़े लोगों की आजीविका भी जुड़ी है.
धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन जब स्थानीय उत्पादों, हुनर और कारोबार को अवसर देते हैं, तो उनका आर्थिक प्रभाव आयोजन स्थल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास के क्षेत्रों तक पहुंचता है.
दीपोत्सव इसी सोच को मजबूती देता है कि आस्था और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं. किसी शहर की सांस्कृतिक पहचान जितनी मजबूत होती है, उसके पर्यटन और स्थानीय कारोबार के विस्तार की संभावनाएं भी उतनी ही बढ़ती हैं.
विरासत से पर्यटन तक अयोध्या का बदलता स्वरूप
योगी सरकार ने दीपोत्सव को एक वार्षिक आयोजन से आगे बढ़ाकर अयोध्या की सांस्कृतिक और पर्यटन पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है. राम मंदिर के निर्माण के बाद रामनगरी की ओर देश-दुनिया का ध्यान और अधिक आकर्षित हुआ है.
ऐसे में दीपोत्सव, धार्मिक स्थलों के विकास और विरासत संरक्षण के प्रयास अयोध्या को सांस्कृतिक पर्यटन के एक बड़े केंद्र के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. इन प्रयासों का उद्देश्य केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि अयोध्या की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को व्यापक पहचान दिलाना भी है.
दरअसल, किसी भी शहर का विकास केवल सड़कों, इमारतों और आधुनिक सुविधाओं के आधार पर नहीं आंका जा सकता. उसकी पहचान, परंपराओं और विरासत को कितनी मजबूती से सहेजा जा रहा है, यह भी विकास का एक महत्वपूर्ण पैमाना है.
अयोध्या का दीपोत्सव इसी विचार को सामने रखता है. यह दिखाता है कि अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हुए उन्हें वर्तमान समय की आवश्यकताओं और नए अवसरों से भी जोड़ा जा सकता है.
दीपोत्सव की वास्तविक उपलब्धि केवल यह नहीं है कि सरयू के घाटों पर कितने दीये जले या कितने विश्व रिकॉर्ड बने. इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि अयोध्या की सांस्कृतिक विरासत जनभागीदारी का उत्सव बनी है, स्थानीय आजीविका को नए अवसरों से जोड़ रही है और भारत की परंपराओं को वैश्विक पहचान दिलाने का माध्यम बन रही है. सरयू के तट पर जलने वाला हर दीया यही संदेश देता है कि विरासत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की शक्ति और भविष्य की पहचान भी है.
(लेखक पॉलिटिकल साइंस की शोधकर्ता और शिक्षाविद हैं. उन्होंने JNU से पीएचडी की है. वर्तमान में वह दिल्ली विश्वविद्यालय में गेस्ट लेक्चरर के तौर पर कार्यरत हैं.)

Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.
