Opinion: यूपी में 50 लाख से ज्यादा कारीगरों की कमाई से जुड़ी है दिवाली, जानिए कैसे
Opinion: इस दिवाली यूपी के बाजारों में विदेशी सामान की जगह स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है. भदोही के कालीन से लेकर मुरादाबाद के पीतल और गोरखपुर के टेराकोटा तक, जानिए किन जिलों के उत्पादों को मिल रही है खास पहचान और ओडीओपी से कितने कारीगर जुड़े हैं.
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Opinion: दीपावली का पावन पर्व खुशियों, अलौकिक प्रकाश और अगाध धार्मिक निष्ठा का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि आज यह उत्तर प्रदेश की आर्थिक गतिविधियों को एक नई, सशक्त और स्वदेशी दिशा देने का ऐतिहासिक अवसर भी बन चुका है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने दीपावली को केंद्र में रखकर 'एक जिला-एक उत्पाद' (ओडीओपी) जैसी योजना के माध्यम से हमारी स्वदेशी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर दिया है.
इस त्योहारी मौसम में यह योजना राज्य की ग्रामीण और स्थानीय अर्थव्यवस्था की धुरी बन गई है. ओडीओपी के तहत तैयार किए गए उत्पाद राज्य के सभी 75 जिलों में स्थानीय कारीगरों, बुनकरों और सूक्ष्म उद्यमियों के जीवन में समृद्धि, आशा और स्वावलंबन की वास्तविक रोशनी ला रहे हैं.
यह पारंपरिक कलाओं को लुप्त होने से बचाने के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'वोकल फॉर लोकल' और 'आत्मनिर्भर भारत' की अवधारणा को उत्तर प्रदेश की धरती पर पूरी तरह साकार करने का महती प्रयास है.
एक दशक पहले दीपावली के दौरान बाजारों का परिदृश्य पूरी तरह आयातित सामग्रियों और विदेशी चकाचौंध के कब्जे में हुआ करता था. स्वदेशी हस्तशिल्प और माटी कला हाशिए पर सिसक रही थी, लेकिन आज जब पूरा प्रदेश सजावट, पूजा-सामग्री और उपहारों की खरीदारी के उत्साह में डूबा होता है, तब ओडीओपी योजना स्थानीय बाजारों के हृदय में धड़कती है.
विदेशी झालरों और सजावटी वस्तुओं की जगह अब स्थानीय हस्तशिल्प ने ले ली है. योगी सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक जिले की सदियों पुरानी विशिष्ट सांस्कृतिक और व्यापारिक पहचान को न केवल संरक्षित किया जाए, बल्कि उसे एक वैश्विक ब्रांड के रूप में स्थापित भी किया जाए.
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे सुखद और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पहलू यह है कि त्योहारों पर होने वाला भारी-भरकम वित्तीय लेन-देन अब किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी या बड़े विदेशी कॉरपोरेट घराने की तिजोरी में जाने के बजाय सीधे उत्तर प्रदेश के गांवों और कस्बों में रहने वाले छोटे शिल्पकारों, बुनकरों और व्यापारियों के हाथों में पहुंच रहा है.
जब एक स्थानीय कारीगर अपनी मेहनत का उचित मूल्य पाता है, तो वह उस आय को अपने ही स्थानीय बाजार में भोजन, वस्त्र, शिक्षा और अन्य आवश्यक सेवाओं पर खर्च करता है. इससे पूरे जिले और प्रदेश की आर्थिक नींव सुदृढ़ होती है.
इसी लोक-कल्याणकारी दृष्टि को स्वर देते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेशवासियों को धन्वंतरि जयंती की शुभकामनाएं देते हुए आग्रह किया कि इस त्योहारी सीजन में उपहार देने के लिए चीन निर्मित या आयातित वस्तुओं का पूर्ण बहिष्कार कर केवल ओडीओपी और स्वदेशी उत्पादों को ही अपने उत्सव का हिस्सा बनाएं.
मुख्यमंत्री का यह स्पष्ट संदेश है कि हमें 'लोकल वाली दिवाली' मनाकर उन कर्मठ कारीगरों और शिल्पकार परिवारों के श्रम का सम्मान करना चाहिए, जो दिन-रात एक करके हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखे हुए हैं.
उन्होंने भदोही के विश्वप्रसिद्ध कालीन, प्रयागराज के अत्यंत सुंदर मूंज शिल्प, मैनपुरी की कलात्मक तारकशी और चित्रकूट के मनमोहक काष्ठ खिलौनों का विशेष उल्लेख किया, जिन्हें योगी सरकार ने राज्य की विशिष्ट पहचान के रूप में पुनः स्थापित किया है.
यह सरकार के निरंतर और सघन प्रयासों का ही परिणाम है कि उत्तर प्रदेश, जो कभी आर्थिक पिछड़ेपन का दंश झेलता था, आज निर्यात के नए कीर्तिमान गढ़ रहा है. धनतेरस की परंपरा के अनुसार मुरादाबाद का पीतल शिल्प आज सबसे अधिक मांग में है.
वहां के नक्काशीदार दीये, पूजा की थालियां और लक्ष्मी-गणेश की भव्य मूर्तियां बाजार में छा गई हैं. फिरोजाबाद के कांच उद्योग से निर्मित फानूस, झूमर और सजावटी मोमबत्ती स्टैंड हर घर की रौनक बढ़ा रहे हैं. वाराणसी की बनारसी साड़ियां और जरदोजी के परिधान प्रीमियम उपहारों के लिए पहली पसंद बनकर उभरे हैं.
इसके साथ ही बुलंदशहर के खुर्जा की सिरेमिक क्रॉकरी, गोरखपुर का पूजनीय और पर्यावरण-अनुकूल टेराकोटा शिल्प (जिसमें मिट्टी के दीये, हाथी-घोड़े और मूर्तियां शामिल हैं), लखनऊ की नजाकत भरी चिकनकारी, कन्नौज के प्राकृतिक इत्र और अगरबत्तियां तथा चित्रकूट के हस्तनिर्मित लकड़ी के खिलौने दीपावली के बाजार पर राज कर रहे हैं.
रोजगार और स्वावलंबन के मोर्चे पर भी योगी सरकार की यह योजना एक मूक आर्थिक क्रांति साबित हुई है. आज उत्तर प्रदेश में ओडीओपी और पारंपरिक 'माटी कला योजना' से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 50 लाख से अधिक कारीगर, बुनकर, मूर्तिकार, कुम्हार और छोटे व्यापारी जुड़े हुए हैं.
माटी कला बोर्ड का गठन और दो लाख से अधिक कारीगरों को आधुनिक टूलकिट व इलेक्ट्रिक चाक का वितरण सरकार की 'अंत्योदय' के प्रति अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है. इससे न केवल उनकी उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, बल्कि उनके उत्पादों की गुणवत्ता भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की हो गई है.
दीपावली के इन 15-20 दिनों के विशेष सीजन में ये लाखों परिवार अपनी वार्षिक आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा अर्जित करते हैं. यह सरकार की दूरदर्शी नीतियों का ही परिणाम है कि मुरादाबाद के धातु ढलाई कारीगरों से लेकर गोरखपुर के प्रजापति समाज तक, समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में अभूतपूर्व सुधार हुआ है और उनके घरों में भी स्वाभिमान व समृद्धि का अमिट दीपक जल उठा है.
दीपावली के अवसर पर विदेशी सामानों को त्याग कर स्वदेशी ओडीओपी उत्पादों को अपनाने की यह सरकारी नीति बहुआयामी और बहुस्तरीय लाभ दे रही है. इसका सबसे बड़ा लाभ आर्थिक सशक्तीकरण और समावेशी विकास है, जहां धन का प्रवाह महानगरों से निकलकर सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर मुड़ गया है.
दूसरा बड़ा लाभ राज्य के राजस्व और निर्यात में ऐतिहासिक वृद्धि है, जिससे उत्तर प्रदेश तेजी से भारत के 'ग्रोथ इंजन' के रूप में स्थापित हो रहा है. तीसरा सबसे संवेदनशील पहलू हमारी सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण है. आज की युवा पीढ़ी जब अपने ही राज्य के इन कलात्मक उत्पादों को खरीदती है, तो सदियों पुरानी कलाएं लुप्त होने से बच जाती हैं और उन्हें नया जीवन मिलता है.
चौथा, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अथाह अवसर सृजित होने से गांवों से शहरों की ओर होने वाले दर्दनाक पलायन पर एक बड़ी और प्रभावी रोक लगी है. अंततः, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि ये सभी उत्पाद, चाहे वे मिट्टी के दीये हों, सूती व रेशमी वस्त्र हों, मूंज की टोकरियां हों या काष्ठ कला से बनी वस्तुएं, प्लास्टिक-मुक्त और पूर्णतः बायोडिग्रेडेबल (पर्यावरण-अनुकूल) हैं. इससे त्योहारों के दौरान बढ़ने वाले प्रदूषण और कचरे पर स्वतः ही नियंत्रण लगता है.
(इस लेख के लेखक वरिष्ठ पत्रकार जगदीश त्रिपाठी हैं)
Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.
